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चौपाल: आदर्श की जगह

आज सारा विश्व भारत को एक युवा देश के रूप में देखता है लेकिन यह कड़वा सच है कि इस मुल्क में युवाओं को विकास के समुचित अवसर नहीं मिल रहे हैं। युवाओं का एक बड़ा प्रतिशत जीवन में कुछ करने के सपने ही देखता रह जाता है।

Author March 13, 2018 04:35 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल खबर के प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है।

आदर्श की जगह

देश के युवाओं को अपराधों में संलग्न देख कर कुछ लोग सुझाव देते हैं कि इनमें नैतिकता की कमी को स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में नैतिक शिक्षा देकर पूर्ण किया जा सकता है। लेकिन वे भूल जाते हैं कि जिस समाज या व्यवस्था में कोई बच्चा जन्म लेता और बड़ा होता है, वहां से बिना कुछ सिखाए बहुत कुछ वह स्वयं ही सीख जाता है। जिस समाज में पल कर वह स्वयं को जानना-समझना सीखता है, उसी समाज में अपने बड़ों, माता-पिता, समुदाय के लोगों, नेताओं और अपने चारों ओर चल रहे जीवन के अनुभवों से कुछ निष्कर्ष खुद निकाल लेता है। किसी भी पीढ़ी के मन में जोर-जबरदस्ती आदर्श नहीं ठूंसे जा सकते। जीवन के आदर्श और मूल्य वह अपने परिवार, समाज और समुदाय को देखकर ग्रहण करती है। युवा मानस में तर्क शक्ति की तेज धार होती है जिसकी कसौटी पर वह अपनी व्यवस्था की रीति-नीतियों को कसता है।

आज सारा विश्व भारत को एक युवा देश के रूप में देखता है लेकिन यह कड़वा सच है कि इस मुल्क में युवाओं को विकास के समुचित अवसर नहीं मिल रहे हैं। युवाओं का एक बड़ा प्रतिशत जीवन में कुछ करने के सपने ही देखता रह जाता है। शिक्षा का बोझ एक तनाव बन कर उनकी गर्दन पर सवार रहता है। ‘प्री नर्सरी’ से लेकर कॉलेज में दाखिले और फिर नौकरी पाने के लिए उन्हें गला काट प्रतियोगिता से जूझना पड़ता है। बोर्ड परीक्षाओं के तनाव में आत्महत्या करते बच्चों और उच्चतर माध्यमिक परीक्षाओं में ईमानदारी की जांच के लिए संघर्ष करते युवाओं के लिए पूरी व्यवस्था ने नैतिकता के कौन से उदाहरण प्रस्तुत किए हैं? आये दिन देश में भ्रष्टाचार के बढ़ते मामलों और घोटालों में नेताओं और जिम्मेदार लोगों को लिप्त देखकर युवा मानस भला नैतिकता के कौन से सबक सीख सकता है? यदि युवाओं को नैतिकता की शिक्षा देनी है तो उन्हें एक भ्रष्टाचार मुक्त देश और समाज देना होगा। उन्हें अपनी ऊर्जा और प्रतिभा को फलीभूत करने के अवसर उपलब्ध कराने होंगे क्योंकि कोरी उपदेशात्मक नैतिकता उनके मन में कुंठा के अलावा कुछ भी पैदा नहीं करेगी। उनके मानस में छिपी रचनात्मकता को दिशा देनी होगी क्योंकि देश का भविष्य ‘मनसा वाचा कर्मणा’ यही लोग लिखेंगे। बेरोजगार युवा मानस ‘खाली दिमाग शैतान का घर’ ही साबित होगा। हमें यह समझना होगा कि नैतिकता का पाठ किसी बंद कक्षा में नहीं, बल्कि जिंदगी के खुले प्रांगण में सीखा जाता है। इसलिए सरकार और समाज दोनों के द्वारा युवाओं के समक्ष कुछ ईमानदार उदाहरण प्रस्तुत करना बहुत आवश्यक है।
’सुमन, प्लेटिनम एन्क्लेव, रोहिणी, दिल्ली

एक दिन
पिछले दिनों महिला दिवस की बधाई देते हुए कई लोगों ने कहा कि आज तो तुम लोगों का दिन है। मेरा उन्हें जवाब था कि आपकी मानसिकता के अनुसार आज हमारा दिन है लेकिन मेरी मानसिकता के अनुसार हर रोज जैसे आपका दिन है वैसे ही मेरा भी दिन है। सोचती हूं कि महिला दिवस पर जो इज्जत महिलाओं को मिली क्या हर रोज उन्हें यही इज्जत मिलती है? नहीं, महिला दिवस पर जो बधाई देते हैं उन्हीं में कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जो लड़कियों के साथ छेड़खानी या बलात्कार जैसे घिनौनी हरकतें करेंगे। आप केवल एक दिन महिलाओं को यह इज्जत देकर अच्छे नहीं बन जाओगे। हमारी विनती है कि अपनी मानसिकता महिला दिवस के लिए ही क्यों बदलते हो, इसे हमेशा के लिए बदल दो। फिर देखिए, हर महिला के लिए हर रोज महिला दिवस होगा।
’चित्रप्रिया कुमारी, आंबेडकर कॉलेज, दिल्ली

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