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चौपाल: क्या जरूरत

महात्मा गांधी ने अपने कई पत्रों में रूस की क्रांति के जनक लेनिन की तारीफ की थी। लेनिन की मूर्ति को ध्वस्त करना उन सब लोगों की भावनाओं पर बुलडोजर चलाने के समान है जो लेनिन के आदर्शों पर चलते हैं। इस कृत्य की सफाई में समर्थकों का मानना है कि मूर्ति तो विवेकानंद, आंबेडकर या सुभाष चद्र बोस की लगनी चाहिए थी।

Author March 13, 2018 4:33 AM
त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमा ढहाई गई (वीडियो स्क्रीनशॉट)

क्या जरूरत
त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद कुछ समर्थकों ने रूस के क्रांतिकारी नायक ब्लादिमीर लेनिन की मूर्ति को ध्वस्त कर दिया। अभी तक तो यही सुना और देखा था कि जीत की खुशी लोगों की आंखों पर अहंकार का परदा डाल देती है लेकिन इस बार लगता है कि आंखों में मिर्च पड़ गई जो लेनिन की मूर्ति बर्दाश्त नहीं हो पाई। लेनिन की मूर्ति के साथ ही बुलडोजर से मानो भारतीयता को भी नष्ट कर दिया हो! सिर्फ यह वजह कि पूर्व की माकपा सरकार की विचारधारा रूस के महान नेता लेनिन से मिलती-जुलती है, किसी भी व्यक्ति को उस मूर्ति और उस विचारधारा को ध्वस्त करने की आजादी नहीं देती। लेनिन रूसी क्रांति के महानायक रहे हैं और ऐसे करोड़ों लोग हैं जो लेनिन को अपना आदर्श मानते हैं। उनमें से एक भगत सिंह और महात्मा गांधी भी रहे हैं। महात्मा गांधी ने अपने कई पत्रों में रूस की क्रांति के जनक लेनिन की तारीफ की थी। लेनिन की मूर्ति को ध्वस्त करना उन सब लोगों की भावनाओं पर बुलडोजर चलाने के समान है जो लेनिन के आदर्शों पर चलते हैं। इस कृत्य की सफाई में समर्थकों का मानना है कि मूर्ति तो विवेकानंद, आंबेडकर या सुभाष चद्र बोस की लगनी चाहिए थी। सवाल है कि त्रिपुरा में अपनी जीत की खुशी में किसी सूने पड़े चौराहे पर भारतीय आदर्श विवेकानंद, आंबेडकर या नेताजी की मूर्ति की स्थापना कर देते, लेकिन जीत की खुशी में लेनिन की मूर्ति को ध्वस्त करने की क्या आवश्यकता थी?
’अनामिका बहुगुणा, देहरादून, उत्तराखंड

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सद्भाव का तकाजा
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विधानसभा में कहा, ‘मैं एक हिंदू हूं इसलिए ईद नहीं मनाता हूं।’ हमारा निवेदन है कि अब वे गोरखपुर से सांसद नहीं हैं और न हिंदू वाहिनी के अध्यक्ष। वे प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और मुख्यमंत्री किसी भी धर्म, समुदाय या जाति का नहीं बल्कि पूरे प्रदेश का होता है। इसलिए जिस संविधान की शपथ लेकर वे इस महत्त्वपूर्ण पद पर पहुंचे हैं, उन्हें उसका मान रखना चाहिए। हमारा देश धर्मनिरपेक्ष है न कि पंथसापेक्ष। उन्हें ऐसे विचार सामने रखने चाहिए जिनसे नागरिकों के बीच भाईचारा बढ़े, न कि उनके बीच दीवार खड़ी हो। जिस प्रदेश के वे मुख्यमंत्री हैं उसमें राम भी जन्मे हैं और रहीम भी। यह वही धरती है जहां हिंदी और उर्दू मिश्रित भाषा लोगों को एक-दूसरे के दुख-सुख बांटने में मदद करती है। यह वही जमीन है जहां ईद की दावत एक हिंदू भी देता है और एक मुसलिम भी दिवाली की खरीदारी करता है। इसलिए सांपदायिक सोच को परे रखा जाना चाहिए।
’अभिषेक पांडेय, मोहाली, पंजाब

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