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चौपाल: हॉकी के रत्न

एक मैच में तो ध्यानचंद की हॉकी स्टिक को तोड़कर देखा गया कि कहीं उसमें चुंबक तो नहीं! उनकी उपलब्धियां सभी भारतीयों को गौरवान्वित करती हैं।

Author August 29, 2018 3:07 AM
मेजर ध्यानचंद का निधन 3 दिसंबर 1979 को हो गया था। 29 अगस्त को उनकी जयंती है।

भारतीय हॉकी के पर्याय मेजर ध्यानचंद के जन्मदिन 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। हॉकी के इस जादूगर ने अपने पूरे खेल जीवन में 1000 से भी ज्यादा गोल किए। उन्होंने भारत को तीन बार स्वर्ण पदक भी दिलाए। उनके खेल में ऐसा जादू था कि मानो हॉकी स्टिक की तरफ गेंद खुद खिंची चली आती थी। एक मैच में तो ध्यानचंद की हॉकी स्टिक को तोड़कर देखा गया कि कहीं उसमें चुंबक तो नहीं! उनकी उपलब्धियां सभी भारतीयों को गौरवान्वित करती हैं। 1956 में उन्हें पद्मभूषण सम्मान से नवाजा गया। विडंबना है कि वे जिस पुरस्कार और सम्मान के हकदार थे, उन्हें नहीं मिला। हकीकत में वे भारत के अनमोल रत्न थे। मेजर ध्यानचंद को मरणोपरांत भारतरत्न से सम्मानित करना चाहिए।

जफर अहमद, रामपुर डेहरू, मधेपुरा, बिहार

कैसी कश्मीरियत
जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है लेकिन अफसोस की बात है कि आजादी के बाद से ही पाकिस्तान द्वारा पोषित आतंकवादी और अलगाववादी धरती के इस स्वर्ग तो नरक बनाने पर तुले हैं। वहां के युवाओं को बरगला कर भड़काया जाता है, उन्हें हाथों में किताबों की बजाय बंदूकें थमा कर आतंकवाद के के आत्मघाती रास्ते पर धकेल दिया जाता है। नतीजतन, कश्मीर के युवाओं का एक बड़ा हिस्सा अलगाववादी दुष्प्रचार की गिरफ्त में आ गया है जो सैनिकों पर पत्थर बरसाते हैं, बर्बर आतंकी संगठन आईएसआईएस के झंडे लहराते हैं और अपने देश का राष्ट्रीय ध्वज फहराने, भारत माता की जय और वंदेमातरम बोलने आदि का मुखर होकर हिंसात्मक विरोध करते हैं। ऐसा ही उन्होंने कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला के साथ किया।

दिल्ली में पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी की श्रद्धांजलि सभा में फारूक अब्दुल्ला ने ‘भारत माता की जय’ और ‘जय हिंद’ के नारे लगाए थे। इसके विरोध में फारूक अब्दुल्ला के साथ श्रीनगर में ईद की नमाज के अवसर पर बदसलूकी की गई और उनकी तरफ जूते उछाले गए। इस तरह की घटनाओं की जितनी भी निंदा की जाए कम है और ऐसी हरकतों के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई स्थान नहीं है। क्या इसे कश्मीरियत कहा जा सकता है?
’सुनील कुमार सिंह, मेरठ, उत्तर प्रदेश

सिनेमा का उद्देश्य
भारतीय सिनेमा का उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक संदेश देना भी रहा है। एक जमाने में फिल्मों का मुख्य किरदार गरीबी, लाचारी और अन्याय के खिलाफ संघर्ष से जीत हासिल करता था लेकिन अब फिल्में अश्लीलता से शुरू होकर हिंसा पर खत्म हो जाती हैं। फिल्मों में हिंसा और क्रूरता से युवा वर्ग भ्रमित हो रहा है जिसका समाज पर गहरा असर पड़ रहा है। ऐसे में जरूरी है कि सिनेमा में सकारात्मक बदलाव हो।
महेश कुमार, सिद्धमुख, राजस्थान

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