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चौपाल: आबादी की चुनौती

हाल ही में स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक परिपत्र जारी किया था, जिसके अनुसार देश में बाल मृत्यु दर (0-5 वर्ष) लगातार कम हो रही है। वर्ष 2014-15 में यह आंकड़ा 43 बच्चे प्रति हजार था, जो वर्ष 2016 में घट कर 39 बच्चे प्रति हजार हो गया। 2017 में घोषित राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में 2025 तक जन्मदर को 2.1 तक सीमित करने का लक्ष्य रखा गया है।

Author March 22, 2018 4:42 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

आज देश में अधिकांश समस्याओं का मूल कारण खोजें तो जनसंख्या वृद्धि ही सामने आती है। बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और जीवन शैली में व्यापक सुधार के कारण हमारे यहां अब जीवन प्रत्याशा 1951 के 37 वर्ष की तुलना में बढ़ कर 67 वर्ष से अधिक हो गई है। एक अनुमान के मुताबिक जिस तेजी से जनसंख्या वृद्धि हो रही है, उस हिसाब से भारत 2025 तक चीन को पीछे छोड़ कर दुनिया का सर्वाधिक आबादी वाला देश हो जाएगा। ऐसे में संसाधनों का दोहन कई गुना बढ़ जाएगा और देश संकटमय परिस्थितियों में घिरता जाएगा। बढ़ती आबादी को नियंत्रित करना आज की सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसे में राष्ट्रीय परिवार एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण की हालिया रिपोर्ट एक शुभ संकेत है। इसके अनुसार देश की कुल प्रजनन दर में कमी आई है। साथ ही शिशु मृत्युदर में भी कमी आई है। राष्ट्रीय परिवार एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण एक व्यापक और कई दौर तक चलने वाला सर्वे है। यह सर्वे पहली बार 1992-93 में देश भर में किया गया था। इसमें जन्म दर, मातृ और शिशु मृत्यु दर के साथ-साथ पोषण, स्वास्थ्य सेवाएं और परिवार नियोजन सहित कई बिंदु शामिल किए जाते हैं।

इसका उद्देश्य स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को नीति बनाने के लिए आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराना है। पिछले राष्ट्रीय परिवार एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण में प्रति महिला शिशु जन्म दर 2.7 थी, जो इस सर्वेक्षण में घटकर 2.2 हो गई है। इस सर्वेक्षण में कुल आठ लाख तीन हजार दो सौ ग्यारह परिवार शामिल किए गए थे। शिशु जन्मदर में कमी का कारण सरकार द्वारा चलाए जाने वाले परिवार नियोजन कार्यक्रम, जागरूकता अभियान और प्रोत्साहन कार्यक्रम हैं। इसके अतिरिक्त बढ़ती महंगाई, महंगी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और आधुनिक जीवन शैली को भी इसका कारण बताया गया है।

हाल ही में स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक परिपत्र जारी किया था, जिसके अनुसार देश में बाल मृत्यु दर (0-5 वर्ष) लगातार कम हो रही है। वर्ष 2014-15 में यह आंकड़ा 43 बच्चे प्रति हजार था, जो वर्ष 2016 में घट कर 39 बच्चे प्रति हजार हो गया। 2017 में घोषित राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में 2025 तक जन्मदर को 2.1 तक सीमित करने का लक्ष्य रखा गया है। राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वेक्षण की हालिया रिपोर्ट से देश में अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने की उम्मीद जगी है। सीमित जनसंख्या के अपने लाभ हैं। इससे संसाधनों का सही इस्तेमाल, सरकारी योजनाओं की सफलता, वित्तीय बोझ में कमी और बेरोजगारी पर लगाम आदि संभव होते हैं।
’प्रखरादित्य द्विवेदी, बेतियाहाता, गोरखपुर

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