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चौपाल: विनाश का मार्ग

दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन शहर की भांति दुनिया के अन्य कई शहर जल शून्यता के कगार पर खड़े हैं। भारत के भी लगभग 21 शहर इसी कतार में शामिल हैं लेकिन अफसोस इस बात का है कि हमारे देश के लोगों तथा प्रशासन ने इस ओर से आंखें मूंद रखी हैं।

पेयजल का संकट आज किसी एक शहर, नगर या देश की नहीं बल्कि वैश्विक समस्या का रूप ले चुका है। दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन शहर की भांति दुनिया के अन्य कई शहर जल शून्यता के कगार पर खड़े हैं। भारत के भी लगभग 21 शहर इसी कतार में शामिल हैं लेकिन अफसोस इस बात का है कि हमारे देश के लोगों तथा प्रशासन ने इस ओर से आंखें मूंद रखी हैं। देश के नगरों को ‘स्मार्ट सिटी’ बनाने की अंधी दौड़ में बड़े-बड़े शोरूम और आधुनिक मॉल्स का निर्माण कार्य चलता रहता है।

इन इमारतों के तलघर में शोरूम बनाने के लिए जब गहरी खुदाई की जाती है तो पहले उस गहराई में मौजूद भूमिगत जल को ज्यादा हॉर्स पावर के पंप लगा कर बाहर फेंका जाता है ताकि नींव रखने के लिए सूखी जमीन मिल सके। यह जल दोहन एक इमारत के लिए कई-कई दिनों तक चलता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितनी बड़ी मात्रा में भूमिगत जल को निकाल कर बर्बाद किया जा रहा है। आश्चर्य इस बात का है कि एक ओर भूमिगत जल के स्तर को बढ़ाने के लिए सरकार ‘वाटर हार्वेस्टिंग’ के लिए पैसा खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर प्रशासन की नाक तले इस प्रकार के अनुचित और अवैध कार्य हो रहे हैं।

अपने प्राकृतिक संसाधनों की कीमत पर किया गया विकास वास्तव में विकास नहीं बल्कि विनाश है। किसी भी विकास योजना को कार्यान्वित करते समय क्या सिर्फ तात्कालिक लाभों को देखकर संतुष्ट हो जाना चाहिए? हमारी वैज्ञानिक सोच और दूरदर्शिता कहां चली गई है? कुछ समय पूर्व दिल्ली के लुटियंस जोन में सांसदों के आवास निर्माण के लिए वहां के हजारों वृक्षों को काटने की अविवेकपूर्ण योजना क्या सिद्ध करती है? क्या हमने सचमुच विनाश का मार्ग चुन लिया है?
’सुमन शर्मा, रोहिणी, दिल्ली

शिक्षा के साथ
पांच सितंबर को देश में शिक्षक दिवस मनाया गया। शिक्षक के बिना इंसान कोई मुकाम हासिल नहीं कर सकता। एम्मा गोल्डमैन ने कहा है कि ‘किसी ने भी अभी तक बच्चे की आत्मा में छुपे सहानुभूति, दया और उदारता के खजाने को पूरी तरह नहीं जाना है। वास्तविक शिक्षा का प्रयास उस खजाने को खोलना होना चाहिए।’ इंसान जब जन्म लेता है तब उसका दिमाग एक कोरे कागज की तरह होता है। बच्चों के पथभ्रष्ट होने का कारण अच्छे संस्कारों का कम या बिल्कुल न होना और शिक्षा प्रणाली में कुछ दोष आना भी है। एक समय था जब अपना कोई अध्यापक दूर से भी दिख जाता था तो उसके शिष्य रास्ता बदल लेते थे, लेकिन आज तो अध्यापक के सामने भी कुछ छात्र ऐसे छाती चौड़ी करके निकलते हैं जैसे वह उनका कोई दुश्मन हो।

गुरु से गोली की भाषा बोलने और विद्यार्थियों के पथभ्रष्ट होने के लिए उनके मां-बाप और अध्यापक काफी हद तक जिम्मेदार माने जा सकते हैं। इंसान की प्रथम पाठशाला घर-परिवार है। घर-परिवार के संस्कार और माहौल ही बच्चे के अच्छे-बुरे चरित्र का निर्माण करता है। लेकिन अगर बच्चों को शिक्षा संस्थानों में भी नैतिकता और संस्कार सिखाएं जाएं तो वे नैतिकता की राह चलें, अपने गुरुओं, माता-पिता और बड़ों का सम्मान करें। शिक्षा संस्थान विद्यार्थियों को डॉक्टर, इंजीनियर, वकील या और कुछ बनाने के साथ-साथ आदर्श और मर्यादित विद्यार्थी भी बनाएं। वे ही सभ्य समाज का निर्माण कर सकते हैं।
’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

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