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चौपाल: औचित्य की कसौटी

निस्संदेह देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही है, जोचिंताजनक है। इसका विरोध होना चाहिए, लेकिेन साथ ही इस विरोध को औचित्य की कसौटी पर भी कसा जाना चाहिए।

Author September 14, 2018 4:13 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (image source-Facebook)

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों और महंगाई के खिलाफ कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने भारत बंद का आयोजन किया। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष को अधिकार है कि वह सरकार की जनविरोधी नीतियों-कार्यों के विरुद्ध आवाज उठाए। लेकिन एक स्वस्थ लोकतंत्र में अपने अधिकारों का प्रयोग करने के साथ-साथ कर्तव्यों का पालन करना भी आवश्यक होता है। निस्संदेह देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही है, जोचिंताजनक है। इसका विरोध होना चाहिए, लेकिेन साथ ही इस विरोध को औचित्य की कसौटी पर भी कसा जाना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि महज पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि को महंगाई में वृद्धि मान कर उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने के बजाय महंगाई को समग्र रूप में लिया जाना चाहिए।

यदि ऐसा किया होता तो शायद भारत बंद करने की आवश्यकता ही नहीं होती, क्योंकि केवल पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें आम-जीवन को प्रभावित नहीं करतीं, बल्कि अनेकानेक अन्य वस्तुएं की बढ़ती कीमतें भी प्रभावित करती हैं। तब समग्र रूप में महंगाई में वृद्धि ऐसी दृष्टिगोचर नहीं होती कि उसके विरोध के लिए भारत बंद कराने तक की जरूरत पड़े। यह ठीक है कि महंगाई में वृद्धि का परिणाम सरकार को भुगतना पड़ता है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अनावश्यक व औचित्यहीन भारत बंद जैसे कार्यों का खमियाजा विपक्ष को भी भुगतना पड़ सकता है।

प्राय: ऐसे बंद को लेकर पक्ष-विपक्ष द्वारा सफलता-विफलता के दावे-प्रतिदावे किए जाते हैं, लेकिन उसका कोई लाभ देश की जनता को कभी नहीं होता। हां, बंद से देश का जन-जीवन अवश्य अस्त-व्यस्त हो जाता है। ‘बंद’ के दौरान हिंसा और तोडफोड़ में लिप्त लोगों को चिह्नित करके उचित दंड भी अवश्य दिया जाना चाहिए।
’महेंद्र प्रसाद सिंगला, पलवल, हरियाणा

स्त्री का श्रम
भले ही हम प्रगतिशील होने का दंभ भरें लेकिन आए दिन होने वाली घटनाएं हमारी प्रगतिशीलता की पोल खोलती नजर आ जाती हैं। जैसे, कुछ दिन पहले अखबार में आई यह खबर कि एक स्थापित फिल्म नायिका ने नायक की तरह फीस लेने की मांग की थी। बहुत आश्चर्य हुआ यह पढ़ कर। महिला के काम को हर जगह नजरअंदाज किया जाता है मगर सिनेमा का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा, यह अफसोसनाक है। वैसे तो महिला के श्रम को कहीं गिना ही नहीं जाता है और गिना भी जाता है तो पुरुषों से कमतर। जबकि किसी भी फिल्म के सफल होने में महिला और पुरुष दोनों की बराबर भूमिका होती है। सिर्फ पुरुषों के दम पर फिल्म नहीं चल सकती। तो फिर दोनों के पारिश्रमिक में इतना फर्क क्यों?

यह मुश्किल हमारे घर-परिवार, गांव-कस्बों, महानगरों तक में देखने को मिलती है और इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता क्योंकि लिंगभेद की जड़ें हमारे समाज में बहुत गहरे तक जमी हुई हैं। इस बाबतसवाल उठाया जाए तो सुनने को मिलता है कि आजकल लिंगभेदशहरों में कम या खत्म ही हो गया है। हां, गांवों में आज भी है क्योंकि वहां के लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं। इतना बोलकर लोग इस बात से पल्ला झाड़ लेते हैं। यदि गहराई से सोचें तो यह मसला हमारी परवरिश और सामाजिक ताने-बाने की परतें खोलता है जो भारतीय पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं की स्थिति के एक और रूप को बयान करता है। मगर आश्चर्य, हम इस सच से नावाकिफ हैं।
’प्रेरणा, भोपाल

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