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चौपाल: खेलों की खातिर

आगामी ओलंपिक के लिए सरकार कई योजनाओं पर काम कर रही है और इसके परिणाम एशियाई खेलों में देखने को मिले हैं। लेकिन पदक जीत रहे खिलाड़ियों के संघर्ष और दुखों की दास्तान देशवासियों को संवेदनाओं से भिगो देती है।

आज देश में कई ऐसे खिलाड़ी हैं जो ओलंपिक में स्वर्ण पदक हासिल कर सकते हैं बशर्ते उन्हें खोज कर सही तरीके से तराशा जाए। आगामी ओलंपिक के लिए सरकार कई योजनाओं पर काम कर रही है और इसके परिणाम एशियाई खेलों में देखने को मिले हैं। लेकिन पदक जीत रहे खिलाड़ियों के संघर्ष और दुखों की दास्तान देशवासियों को संवेदनाओं से भिगो देती है। केंद्र और राज्य सरकारों को इस हकीकत को गंभीरता से लेना चाहिए और खिलाड़ियों को आधुनिक और समुचित सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए। सरकार उनके भविष्य की सुरक्षा की गारंटी भी ले तभी वे निश्चिंत होकर अपनी सारी ऊर्जा खेलों में लगा सकते हैं और ओलंपिक में गोल्ड दिला सकते हैं। भूख और भविष्य की चिंता खिलाड़ी के सर्वोत्तम प्रदर्शन को रोक देती है। उम्मीद है कि इस एशियाई खेलों में मिली ऊर्जा को ओलंपिक में इस्तेमाल करने से भारत को कई पदक मिलेंगे। खेल केवल दुनिया में देश का नाम करने का सर्वोत्तम माध्यम ही नहीं हैं बल्कि देशवासियों के बीच एकता पैदा करने का सर्वोत्तम जरिया भी हैं।
’कल्याण सिंह, इलाहाबाद

बड़ा लक्ष्य
प्रधानमंत्री का सपना देश के सभी लोगों को बेहतर और सस्ती स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराना है। इसे साकार करने के लिए 15 अगस्त को लालकिले की प्राचीर से उन्होंने आयुष्मान भारत योजना की शुरुआत की है। इसका उद्देश्य देश के 10 करोड़ गरीब परिवारों के लगभग 50 करोड़ नागरिकों को पांच लाख रुपए तक प्रति परिवार स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध करना है।
आयुष्मान भारत योजना को लेकर सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब बड़ी संख्या में लोग अस्पतालों में अपना इलाज कराने जाएंगे तो अस्पताल उन्हें कैसे संभालेंगे? दूसरा प्रश्न यह कि करोड़ों रुपए के खर्च से बने अस्पताल क्या अपने मुनाफे को कम करने के लिए तैयार होंगे? तीसरा, इतनी बड़ी आबादी के लिए अस्पतालों में बिस्तर, डॉक्टर, नर्स और पैरा मेडिकल स्टाफ जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव से कैसे निपटा जाएगा? इन सवालों के जवाबों के साथ सरकार को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए ताकि आम नागरिक उम्मीद से निजी अस्पतालों में इलाज के लिए जाएं तो उन्हें गुणवत्तायुक्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो सके।
’पुष्पेंद्र पाटीदार, इंदौर

हमारा आलस
‘आलस्यंहि मनुष्याणां शरीरस्थो महारिपु:’ अर्थात आलस्य मनुष्य के शरीर का सबसे बड़ा शत्रु है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत की 125 करोड़ जनसंख्या में लगभग 42 करोड़ लोग शारीरिक और मानसिक रूप से आलसी हैं। यह रिपोर्ट इस बात की ओर इशारा करती है कि भारत में लोगों की जिंदगी और दिनचर्या सुव्यवस्थित नहीं है। इससे न केवल हमारी, बल्कि देश की छवि भी खराब होती है। भारतीयोंं में आलस्य का मुख्य कारण उनका लक्ष्यहीन जीवन व्यतीत करना है। यहां लोग मेहनत से अधिक भाग्य पर विश्वास करते हैं। यदि यही हालत रही तो न हम विकास कर पाएंगे और न हमारा देश। हमें कबीर के बोल ‘काल करे सो आज कर, आज करे सो अब’ पर अमल करते हुए सक्रिय रहना होगा। योग, प्राणायाम आदि के द्वारा खुद को चुस्त-दुरस्त रखना होगा तभी हमारी और देश की छवि सुधरेगी।
’गीता आर्य, बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश