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चौपाल: भीड़ के शिकार

महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, गुजरात, त्रिपुरा, तमिलनाडु, मणिपुर, कर्नाटक आदि राज्यों में हाल के दिनों में भीड़ की हिंसा के शिकार चाहे हिंदू हों या मुसलमान रहे हों लेकिन उसमें मरने वाले ज्यादातर गरीब लोग हैं। कितनी आसानी से किसी ने अफवाह फैलाई और गरीब उसमें उलझ गए!

Author Published on: July 19, 2018 2:03 AM
भारत की सुप्रीम कोर्ट। Express photo by Abhinav Saha.

कैसी विडंबना है कि जिस दिन सुप्रीम कोर्ट भीड़ की हिंसा पर सख्त रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार को इस बाबत कानून बनाने का निर्देश देता है उसी दिन झारखंड में अस्सी वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश की भीड़ की हिंसा में बुरी तरह पिटाई कर उनके कपड़े फाड़ दिए जाते हैं। साफ है कि भीड़ की हिंसा के जरिए समाज में डर फैलाने वालों को न कानून का भय है, न समाज का। सुप्रीम कोर्ट का यह कहना वाजिब है कि जो लोग प्रताड़ित हो रहे हैं वे पीड़ित हैं, उन्हें भीड़ के हाथों मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। गौरतलब है कि भीड़ की हिंसा में पिछले दो माह में 13 घटनाओं में 27 से अधिक लोग जान गंवा चुके हैं। भीड़ द्वारा हत्या की बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट को यह कहने पर विवश होना पड़ा कि इस तरह की हिंसा के लिए कोई तर्क मान्य नहीं है। इसके पीछे के इरादों को लेकर कोई बात नहीं सुनी जा सकती क्योंकि भीड़ द्वारा किसी की भी जान लेना एक जघन्य अपराध है और इसे हर हाल में रोका जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट को इस तल्ख टिप्पणी की जरूरत इसलिए महसूस हुई कि कानून व्यवस्था को लेकर जिम्मेदार राज्य सरकारें इस कसौटी पर खरी नहीं उतर रही हैं। इसमें दो राय नहीं कि विगत कुछ वर्षों में कभी गाय के नाम पर तो कभी बीफ के नाम पर और कभी बच्चा चोरी के नाम पर निर्दोष लोगों को भीड़ द्वारा निशाना बनाया जा रहा है। हाल के वर्षों में गाय सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पैदा करने वाला जानवर बन चुकी है। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि गाय के नाम पर इंसानों की हत्या हो रही है और राज्यों की पुलिस मूक दर्शक बनी हुई है। ये घटनाएं इसलिए नहीं हो रही हैं कि मौजूदा कानून में कोई कमी है बल्कि इसलिए हो रही हैं कि राज्य सरकारों में उनसे निपटने की इच्छा शक्ति का अभाव है। आखिर क्या वजह है कि इस तरह की हिंसा को रोकने, पुलिस सुधारों को लागू करने और कानून हाथ में लेने वालों के खिलाफ सारे राजनीतिक दल एकजुट नजर नहीं आते? जब तक राजनीतिक पार्टियां अपने संकीर्ण हितों के लिए दोहरे मापदंड अपनाती रहेंगी तब तक भीड़ की हिंसा इसी तरह कानून को मुंह चिढ़ाती रहेगी।

भीड़ की हिंसा को हवा देने में सोशल मीडिया, खासतौर से वाट्सएप एक बड़ा विलेन बन कर आमने आया है क्योंकि सबसे ज्यादा करीब दो अरब लोग इसका इस्तेमाल करते हैं। इनमें भी बड़ी तादाद उनकी है जो साक्षर नहीं हैं या कुछ कम पढ़े लिखे हैं। ऐसे में यह एक खतरनाक हथियार बनता जा रहा है। लेकिन यह सिर्फ एक वजह है। इसके अलावा भी भीड़ की हिंसा के लिए कई कारण जिम्मेदार हैं। महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, गुजरात, त्रिपुरा, तमिलनाडु, मणिपुर, कर्नाटक आदि राज्यों में हाल के दिनों में भीड़ की हिंसा के शिकार चाहे हिंदू हों या मुसलमान रहे हों लेकिन उसमें मरने वाले ज्यादातर गरीब लोग हैं। कितनी आसानी से किसी ने अफवाह फैलाई और गरीब उसमें उलझ गए! अफवाहें हमारे समाज में कोई नई नहीं हैं। कभी गणेश जी दूध पीने लगते हैं तो कभी पत्ती पर नाग देवता की आकृति उभरने लगती है। कभी चोटी काटने की घटना इसका जरिया बनती है तो कभी बच्चा चोरी करने वाला गिरोह सक्रिय होने अथवा मंदिर की दीवार पर किसी आराध्य की छवि उभरने के रूप में ये हमारे सामने आती रही हैं। इस तरह की घटनाओं से सचेत और सावधान रहने की आवश्यकता है।

पहले समस्या सिर्फ मानसिकता सांप्रदायिक होने या धार्मिक उन्माद फैलाने तक सीमित थी लेकिन अब वह भीड़ की हिंसा का रूप लेती जा रही है। सोशल मीडिया की अफवाह को अकेले कानून से नहीं रोका जा सकता है। उसके लिए जन जागरूकता भी जरूरी है। बड़ा सवाल है कि क्या हिंदू क्या मुसलमान, सब तरफ लोग भीड़ में बदलते जा रहे हैं जो किसी को भी मार सकती है। हिंसा उनके सामाजिक-राजनीतिक स्वभाव का हिस्सा बनती जा रही है। इस बंटे हुए समाज में जब तक लोग अपनी नफरतों और विचारधाराओं को किनारे रख कर एक दूसरे से फिर मिलना-जुलना शुरू नहीं करेंगे तब तक वे इसके शिकार होते रहेंगे। लिहाजा, मेलजोल और सौहार्द की साझी विरासत के विस्तार से ही इस तरह की दुष्प्रवृत्तियों पर रोक लगाने की दिशा में आगे बढ़ जाने में ही समझदारी है।
’देवेंद्र जोशी, महेशनगर, उज्जैन

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