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चौपाल: सिर पर मैला

भारत में तकरीबन दस लाख ऐसे लोग हैं जो अपने हाथों से मैला ढो रहे हैं। सीवर श्रमिकों की सुरक्षा स्थितियों में सुधार को लेकर कई अदालती निर्देशों के बावजूद खतरनाक कामकाजी परिस्थितियों के कारण सीवर श्रमिकों की मृत्यु की खबरें नियमित रूप से आती रहती हैं।

Author February 28, 2018 3:11 AM
केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन। (पीटीआई फाइल फोटो)

इन दिनों तमाम उदास करने वाली खबरों और अटपटे बयानों के बीच केरल में भविष्य में रोबोट द्वारा सीवर की सफाई कराने की खबर आई तो बेहद सुखद अनुभव हुआ। केरल के युवा इंजीनियरों ने ऐसा रोबोट बनाया है जो सीवर की सफाई करेगा और इससे भी ज्यादा अच्छा यह जानकर लगा कि केरल सरकार ने पचास रोबोट्स खरीदने का मन बनाया है। अगर यह प्रयोग सफल होता है तो इंसान द्वारा मैला ढोने की अमानवीय प्रथा बीते जमाने की बात हो जाएगी। विज्ञान का इस्तेमाल जब इंसानियत को जिंदा रखने के लिए किया जाता है तो निस्संदेह वह मानव सभ्यता का बेहतरीन उदाहरण बन जाता है।

यह शर्मिंदगी की बात है कि कई राज्यों में आज भी शुष्क शौचालयों का उपयोग होता है और इनमें मानव अपशिष्ट उठाने का काम मानव ही करते हैं, वह भी हाथों और झाड़ू के जरिए। इनके पास कोई खास उपकरण भी नहीं होता है। सीवर सफाई के दौरान हुई मौतों की खबरें अकसर अखबारों की सुर्खियों में रहती हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड के अलावा भी कई राज्यों में आज भी मैला सिर पर ढोया जाता है। जहां एक ओर सभी राजनीतिक दल दलितों की राजनीति करके अपना वोट बैंक साधने में लगे हैं वहीं दूसरी ओर यही नेता इस बात को नजरअंदाज करते आए हैं कि मैला ढोने के इस अमानवीय पेशे में अधिकतर लोग इसी समाज से हैं। उनमें से लगभग अस्सी प्रतिशत दलित महिलाएं हैं जो यह काम कर रही हैं। सरकार आंखें मूंदे स्वच्छ भारत अभियान पर अपना ध्यान केंद्रित किए हुए है। ईमानदार कोशिश के अभाव में यह अच्छा अभियान भी महज टीवी, विज्ञापनों और पोस्टरों तक सिमट कर रह गया है।

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योजना आयोग द्वारा 1989 में स्थापित टास्क फोर्स की उपसमिति के अनुसार देश में लगभग बहत्तर लाख सूखे शौचालय थे। भारत में तकरीबन दस लाख ऐसे लोग हैं जो अपने हाथों से मैला ढो रहे हैं। सीवर श्रमिकों की सुरक्षा स्थितियों में सुधार को लेकर कई अदालती निर्देशों के बावजूद खतरनाक कामकाजी परिस्थितियों के कारण सीवर श्रमिकों की मृत्यु की खबरें नियमित रूप से आती रहती हैं। सफाई कर्मचारी आंदोलन के अनुसार 1993 से अब तक उनके पास ऐसे तेरह सौ सत्तर सीवर श्रमिकों के नाम हैं जिनकी मृत्यु काम करने की खतरनाक परिस्थितियों में हुई। बाकी राज्यों को भी केरल सरकार से सीख लेकर इस प्रथा को समाप्त करने के उपाय करने चाहिएं जिससे मानवीयता को शर्मसार करने वाली इन परंपराओं से समाज को मुक्ति मिल सके। सभी नागरिकों को सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है। सिर्फ परिवार पालने के लिए किसी व्यक्ति को मैला ढोना पड़े तो यह सारी व्यवस्था के लिए कलंक की बात है।

’अश्वनी राघव ‘रामेंदु’, नई दिल्ली

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