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चौपाल: बस्ते का बोझ

हैरान करने वाली बात है कि उनके नेतृत्व वाली समिति ने स्कूली बच्चों के पाठ्यक्रम का बोझ कम करने के लिए जो सिफारिशें की थीं, उन्हें दो दशक से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी अमलीजामा नहीं पहनाया गया था।

Author March 5, 2018 3:21 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

प्रख्यात शिक्षाविद प्रो यशपाल कहा करते थे कि ज्ञान बस्ते के बोझ पर नहीं, शिक्षा देने के तरीके पर निर्भर करता है। उनकी अध्यक्षता में बनी समिति ने शुरुआती कक्षाओं में बच्चों को बस्ते के बोझ से मुक्त करने की सलाह दी थी। वे मानते थे कि बच्चे पढ़ें तो खेल की तरह, वे किताबों से मिलें तो खिलौनों की तरह, देश-दुनिया का ज्ञान उन्हें लुका-छिपी से भी आसान लगे तथा परीक्षाएं उन्हें दोस्तों के गप्प-ठहाकों से भी सहज लगें। हैरान करने वाली बात है कि उनके नेतृत्व वाली समिति ने स्कूली बच्चों के पाठ्यक्रम का बोझ कम करने के लिए जो सिफारिशें की थीं, उन्हें दो दशक से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी अमलीजामा नहीं पहनाया गया था। देर से ही सही, अब मानव संसाधन विकास मंत्रालय छात्रों के स्कूली बस्तों का बोझ कम करने के इरादे से 2019 के सत्र से एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम आधा करने पर विचार कर रहा है, जो स्वागतयोग्य है। लेकिन राज्य सरकारों और राज्य शिक्षा बोर्डों को भी इस पहल का सहभागी बनाने की सख्त दरकार है क्योंकि बस्ते का बोझ बच्चों की शिक्षा, समझ और उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल रहा है।

एसोचैम के एक सर्वे के अनुसार, बस्ते के बढ़ते बोझ के कारण बच्चों को कम उम्र में ही पीठ दर्द जैसी समस्याओं से दो-चार होना पड़ रहा है। इसका हड्डियों और शरीर के विकास पर भी विपरीत असर होने का अंदेशा जाहिर किया गया है। इस सर्वेक्षण के मुताबिक स्कूल जाने वाले करीब 68 प्रतिशत बच्चे, जिनमें विशेष तौर पर देखा जाए तो सात से तेरह वर्ष के करीब 88 फीसद बच्चे पीठ दर्द या उससे जुड़ी समस्या का शिकार हो रहे हैं। इसका प्रमुख कारण किताबों का बोझ, खेल सामग्री और उनके बैग हैं, जो बच्चों के वजन से करीब 40 से 45 फीसद तक ज्यादा होता है। जब से प्राइवेट स्कूलों को अपनी किताबें चुनने का हक मिला है, तभी से निजी स्कूल अधिक मुनाफा कमाने की फिराक में बच्चों का बस्ता भारी करते ही जा रहे हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि सरकारी स्कूल वालों के बस्ते निजी स्कूल वालों के बस्तों से काफी हल्के हैं। सरकारी स्कूलों में प्रारंभिक कक्षाओं में भाषा, गणित के अलावा एक या दो पुस्तकें हैं लेकिन निजी स्कूलों के बस्तों का भार बढ़ता जा रहा है। इसके पीछे ज्ञानवृद्धि का कोई कारण नहीं है, बल्कि व्यापारिक रुचि ही प्रमुख है।

आज स्थिति यह है कि देश भर में लाखों बच्चों को भारी बस्ता ढोना पड़ रहा है। इनमें वे तमाम नामी-गिरामी स्कूल भी शामिल हैं जो कथित तौर पर पठन-पाठन के आधुनिक तरीके अपनाए हुए हैं। मोहल्ला ब्रांड अंग्रेजी स्कूलों के लिए तो भारी बस्ते शुभ लाभ कर रहे हैं। लेकिन बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क पर गैर-जरूरी दबाव बढ़ रहा है और माता-पिता भी होमवर्क की चक्की में पिस रहे हैं। बच्चे की समझ में न आने पर उसे ट्यूशन के हवाले कर दिया जा रहा है और अपनी प्रारंभिक उम्र से ही बच्चा रटी-रटाई शिक्षा लेने पर मजबूर हो रहा है। इससे उसकी मानसिक चेतना कहीं दब कर रह जाती है और उसका सर्वांगीण विकास भी बाधित होता है। ऐसे में सरकार की पहली प्राथमिकता बच्चों का स्वास्थ्य होना चाहिए, इसके लिए सरकार को निजी स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए अब आगे आना होगा।

’कैलाश मांजू बिश्नोई, जोधपुर

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