ताज़ा खबर
 

चौपाल: मजबूरी में एक

विपक्ष दलों को लगने लगा है कि भाजपा के रथ को रोकने के लिए एकजुट होना होगा इसीलिए उनके नेता एक मंच पर जुटने की तैयारी कर रहे हैं। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी राजग का साथ छोड़ कर अलग हो गए।

Author March 12, 2018 2:43 AM
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू।

मजबूरी में एक

तीन पूर्वोत्तर राज्यों में नई सरकारें बनने के बाद भाजपा अब उनतीस में से इक्कीस राज्यों की सत्ता में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से शामिल है। इसके कारण अब विपक्ष दलों को लगने लगा है कि भाजपा के रथ को रोकने के लिए एकजुट होना होगा इसीलिए उनके नेता एक मंच पर जुटने की तैयारी कर रहे हैं। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी राजग का साथ छोड़ कर अलग हो गए। उत्तर प्रदेश के उपचुनाव में बसपा समाजवादी पार्टी के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं उतारेगी। चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम ने राजग से पल्ला झाड़ लिया है। ऊपर से तुर्रा यह कि अलग-अलग राज्यों में विपक्ष के उठाए मुद्दों को आम जनता की ओर से अपेक्षित तवज्जो मिलती नजर नहीं आ रही है। इसी मजबूरी ने कुछ विपक्षों दलों को एक मंच पर ला दिया है। इतिहास में राजनीति के गठबंधन का प्रयोग सफल नहीं रहा है लेकिन किसी भी लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए विकल्प आवश्यक है। पहले सत्ता संघर्ष कांग्रेस बनाम अन्य पार्टियों के बीच होता था लेकिन अब राजनीतिक फिजां पर मोदी का जबरदस्त असर है। इसी कारण वे बेरोजगारी, महंगाई आदि कई अहम मुद्दों को नजरअंदाज करके भी आगे बढ़ते जाते हैं। ऐसे में मिशन 2019 के लिए विपक्षी दलों का मोर्चा बनाने की कवायद की जा रही है जो अनेक दलों के अंतर्विरोधों के कारण उतनी सफल नहीं हो पा रही है। क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों के बीच हितों के टकराव के रहते इसकी ज्यादा उम्मीद भी नहीं है।
’महेश कुमार, सिद्धमुख, राजस्थान

चिकित्सा या व्यापार

हाल ही में नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी ने दिल्ली-एनसीआर के एक अस्पताल के बिल का विश्लेषण किया जिससे पता चला कि वहां के निजी अस्पताल दवाओं, वस्तुओं और उपचार पर मरीजों से मुनाफा ही नहीं वसूल रहे बल्कि उन्हें लूट रहे हैं। आजकल देश में ऐसा हर जगह देखने मिल रहा है। चिकित्सा एक व्यापार बन गया है जिसमें चिकित्सकों, चिकित्सक प्रतिनिधियों और दवा कंपनियों का करोड़ों का व्यापार फल-फूल रहा है। अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को निरंतर बेवकूफ बना कर लूटा जा रहा है। इलाज के लिए लोग घर, मकान और जेवरात तक बेच देते हैं। दवा कंपनी अपनी दवा को ज्यादा से ज्यादा बेचने के लिए चिकित्सक प्रतिनिधि के ऊपर दबाव बनाती है। वह प्रतिनिधि डॉक्टर को दवा की बिक्री कराने पर उपहार और कुछ प्रतिशत कमीशन/ मुनाफा देने की बात कहता है और फिर चालू होता है स्वास्थ्य के नाम पर व्यापार। देश में सरकारी अस्पतालों की हालत खस्ता होने की वजह से लोग निजी अस्पतालों में जाते हैं। ऐसे में सभी सरकारी अस्पतालों में सरकार पर्याप्त चिकित्सक और सुविधाएं मुहैया कराए। सभी निजी अस्पतालों में विभिन्न तरह कीचिकित्सीय जांच और ऑपरेशन का शुल्क एकसमान निर्धारित किया जाए। विभिन्न दवा कंपनियों द्वारा एक ही रासायनिक सम्मिश्रण से बनाई गई दवाओं के मूल्य में बहुत अंतर होता है, इसे कम किया जाए। चिकित्सा उत्पादों पर मुद्रित मूल्य उनके वास्तविक मूल्य से बहुत अधिक होते हैं। जरूरत है, वास्तविक मूल्य अंकित किया जाए ताकि मनमानी लूट से बचा जा सके।
’अमित पांडेय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App