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चौपाल: सुधार की दरकार

सुप्रीम कोर्ट का भी मानना है कि जेलों में कैदियों को ठूंस कर रखना मानव अधिकारों का उल्लंघन है। इस साल 30 मार्च को एक सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय पहले ही कह चुका है कि कैदियों को जानवरों की तरह नहीं रखा जा सकता।

Author August 30, 2018 2:40 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

दिल्ली की तिहाड़ जेल में तेरह साल से अधिक की सजा काट चुके एक कैदी के फरार होने के पीछे की वजह से देश की जेल व्यवस्था फिर चर्चा में है। उस कैदी का अब तक का रिकार्ड बहुत अच्छा रहा और उसने कभी जेल नियमों का उल्लंघन नहीं किया था। हालांकि बाद में वह लौट आया लेकिन उसने फरार होने की वजह यह बताई कि उसे जेल अधिकारियों की कारों की सफाई के लिए भेजा जाता था। वह पहले भी इसका विरोध कर चुका था। उसका कहना था कि गुलामी नहीं करेगा। अधिकारियों द्वारा अपने घर के काम कराए जाने की शिकायत अन्य कैदियों ने भी की है। दरअसल, कैदी अपने जुर्म की सजा काटने जेल आते हैं। उन्हें गुलाम बना कर रखना, उनसे नौकर जैसा काम कराना उचित नहीं है। लेकिन देश की जेलों में ऐसा खूब हो रहा है। उन्हें जेल संहिता के तहत मिलने वाली सुविधाओं से भी वंचित रखा जाता है। जेल की सजा का मतलब उनके साथ अमानवीय और मनमाना व्यवहार करना नहीं होना चाहिए। एक तरफ तो हम जेलों को सुधार गृह में तब्दील करना चाहते हैं मगर दूसरी तरफ इस तरह की यातनाएं कैदी के सुधार के मार्ग में बाधक हैं। इसलिए जेलों को यातनागृह बनने से रोका जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का भी मानना है कि जेलों में कैदियों को ठूंस कर रखना मानव अधिकारों का उल्लंघन है। इस साल 30 मार्च को एक सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय पहले ही कह चुका है कि कैदियों को जानवरों की तरह नहीं रखा जा सकता। अदालत ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि देश की 1400 जेलों में निर्धारित कैदियों की संख्या से करीब 150 से 600 प्रतिशत अधिक तक कैदियों को रखा जा रहा है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट की नजर में कितना गंभीर है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों में कैदियों को जेलों में जानवरों की तरह ठूंस कर रखे जाने पर चिंता व्यक्तकरते हुए न्यायमूर्ति एमबी लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता का खंडपीठ एक मामले में राज्यों के पुलिस महानिदेशक (जेल) को चेतावनी दे चुका है कि यदि इस समस्या से निपटने के लिए वे कोई कारगर कार्ययोजना पेश करने में नाकाम रहते हैं तो उनके खिलाफ अवमानना का मामला भी दर्ज किया जा सकता है।

हाल के दिनों में पटना में कैदियों के भागने की घटना हो या 31 अक्तूबर 2016 को भोपाल सेंट्रल जेल के आठ कैदियों के ‘मुठभेड़’ में मारे जाने की घटना अथवा इसी साल जनवरी में मेरठ में कैदी द्वारा आत्महत्या कर लिए जाने की घटना, ये सब इशारा करती हैं कि भारत की जेलों में सबकुछ ठीकठाक नहीं चल रहा है। कैदी दोहरी प्रताड़ना का शिकार हो रहे हैं। अपने किए अपराध की सजा के साथ जेल सुधार में कमियों का खमियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ रहा है। नेशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी (नालसा) की रिपोर्ट के अनुसार देश भर की जेलों में कर्मचारियों की अनुमोदित क्षमता 77,230 है लेकिन इसमें से तकरीबन 24,588 अर्थात 30 प्रतिशत से अधिक पद खाली पड़े हुए हैं। संविधान की सातवीं अनुसूचित के तहत जेलों का रखरखाव और प्रबंधन पूरी तरह राज्य सरकारों का विषय है। लेकिन दुर्भाग्य का विषय है कि कैदियों का मामला अब भी प्रशासन की प्राथमिकता सूची में नहीं है। जेलों के अंदर की अमानवीय हालात का ही नतीजा है कि आए दिन विभिन्न जेलों में कैदियों के संदिग्ध स्थिति में मारे जाने, उत्पात मचाने, मारपीट करने की खबरें आती रहती हैं। इसलिए जेलों को यातनागृह के बजाय सुधार गृह बनाने पर ध्यान दिए जाने की सख्त दरकार है।
’देवेंद्र जोशी, उज्जैन

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