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चौपाल: मूर्ति से खतरा

त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में मार्क्सवादी पार्टी की हार के बाद लेनिन की प्रतिमा जेसीबी मशीन से गिरा दी गई। ऐसा नहीं है कि लेनिन की प्रतिमा पहली बार गिराई गई। 2013 में यूक्रेन में प्रदर्शनकारियों ने उनकी प्रतिमा तोड़ दी थी।

Author March 12, 2018 2:41 AM
त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमा ढहाई गई (वीडियो स्क्रीनशॉट)

त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में मार्क्सवादी पार्टी की हार के बाद लेनिन की प्रतिमा जेसीबी मशीन से गिरा दी गई। ऐसा नहीं है कि लेनिन की प्रतिमा पहली बार गिराई गई। 2013 में यूक्रेन में प्रदर्शनकारियों ने उनकी प्रतिमा तोड़ दी थी। 1917 की सोवियत क्रांति के नायक लेनिन की कई दूसरी जगहों पर भी प्रतिमाएं हैं। विश्व में पहले भी कई ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं। इराक में लोगों ने सद्दाम हुसैन के विशालकाय बुत रस्सियों से खींचकर गिराए थे। न्यूयॉर्क के बाउलिंग ग्रीन में स्थित जॉर्ज तृतीय का बुत गिराने की घटना को अमेरिका की आजादी के एलान का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। राजनीतिक चश्मे से देखा जाए तो भारत में इससे पहले भी सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक दल ऐसा करते रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने पूरे प्रदेश में चुनाव चिह्न हाथियों के प्रतीक लगवा दिए थे। सरकारी इमारतों को अपने रंग में रंगवा दिया था। उनके बाद सत्ता में आने वाले दलों ने इसमें परिवर्तन किया। आज भी कई स्थानों पर सड़कों के नाम बदल रहे हैं या इतिहास नए सिरे से लिखने की चर्चा हो रही है। निश्चय ही लोग इसे असहिष्णुता से जोड़ सकते हैं।

प्रधानमंत्री अगर गरीबों के बारे में सोचते हैं तो उनकी और लेनिन की मंशा में कोई अंतर नहीं है। फिर भी क्यों उनकी पार्टी के लोग लेनिन की मूर्ति तोड़ कर अपनी जीत का जश्न ऐसे मनाने पर उतर आए जैसे उन्होंने साक्षात लेनिन को मात दी हो! जिन भगत सिंह की शहादत को भारत माता के ये सपूत समय-समय पर याद करते रहते हैं, वे भी लेनिन को अपना आदर्श मानते थे। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि फांसी के फंदे पर झूलने से कुछ घंटे पहले भी भगत सिंह ‘रिवोल्यूशनरी लेनिन’ नाम की किताब पढ़ रहे थे। 21 जनवरी 1930 को जब उन्हें अदालत में पेश किया गया, वहां भी उन्होंने लेनिन जिंदाबाद के नारे लगाए थे।

त्रिपुरा में जिस तरह लेनिन की मूर्ति गिराई गई, उसे देख कर बामियान के बुद्ध याद आ गए। मार्च 2001 में तालिबान के नेता मुल्ला मोहम्मद उमर ने बामियान की पहाड़ियों में बुद्ध की दो मूर्तियों को बम से उड़वा दिया था। बुद्ध ने शांति और अहिंसा का संदेश दिया, जबकि तालिबान आतंक को अपना धर्म मानते हैं इसलिए शांतिदूत बुद्ध उन्हें नागवार गुजरे। दरअसल, किसी मूर्ति या प्रतीक को तोड़ने का मकसद उस पंथ की स्मृतियों को दूर करना हो सकता है, जो सदियों तक लोगों के मन-मस्तिष्क को प्रभावित करती हों। लेकिन क्या आज भाजपा के विचार इतने कमजोर हैं कि उन्हें एक मूर्ति से ही खतरा लगने लगा!
’कुशाग्र वालुस्कर, भोपाल, मध्यप्रदेश

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