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चौपाल: हादसे की नींव

रिपोर्ट के अनुसार इस तरह की हजारों अवैध इमारतें सिर्फ गाजियाबाद में बन कर खड़ी हैं और कम कीमत की वजह से गरीब लोग अपनी जीवन भर की कमाई लगाकर उनमें रहने को मजबूर हैं।

Author July 21, 2018 1:58 AM
पश्चिमी ग्रेटर नोएडा के शाहबेरी गांव में सारे नियम कायदों को ताक पर रख कर बनाई गर्इं दो इमारतें मंगलवार की रात नौ बजे भरभरा कर गिर गर्इं थीं।

पश्चिमी ग्रेटर नोएडा के शाहबेरी गांव में सारे नियम कायदों को ताक पर रख कर बनाई गर्इं दो इमारतें मंगलवार की रात नौ बजे भरभरा कर गिर गर्इं। इस हादसे में नौ लोग काल के गाल में समा गए। उनके परिजन आश्रयविहीन होकर रह गए। बिल्डर को पैसा मिल गया और संबंधित विभागों के अफसरों-कर्मचारियों के बीच उसकी बंदरबांट हो गई होगी।
खबरों के अनुसार दो सौ वर्ग मीटर के दो प्लाटों में छह-छह मंजिला दो इमारतों का निर्माण एकदम घटिया सामग्री से किया गया था। इस क्षेत्र में सीवर लाइन भी नहीं पड़ी हुई है। इस समस्या के समाधान के लिए इन्हीं भवनों के बेसमेंट में बिल्डरों ने सेप्टिक टैंक बनवा दिया था। यहां नालियों की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण पिछले दिनों सड़कों पर वर्षा का पानी भरने से इन बिल्डिंगों की नींव कमजोर हो गई। जमीन रेतीली होने के कारण जलभराव का पानी नींव में चले जाने, रेतीली जमीन के बैठ जाने से एक बिल्डिंग बगल वाली बिल्डिंग पर गिर गई, जिससे दोनों ही बिल्डिंगें निर्दोष परिवारों सहित जमींदोज हो गर्इं। ये बिल्डिंगें जहां बनाई गई हैं, वहां का रास्ता भी अत्यंत संकरा है, जहां बचाव कार्य के लिए राष्ट्रीय आपदा बचाव बल की गाड़ियों को रास्ता भी जैसे-तैसे मिला। रिपोर्ट के अनुसार इस तरह की हजारों अवैध इमारतें सिर्फ गाजियाबाद में बन कर खड़ी हैं और कम कीमत की वजह से गरीब लोग अपनी जीवन भर की कमाई लगाकर उनमें रहने को मजबूर हैं।

ऐसे अवैध निर्माण में जीडीए, नगर निगम और संबंधित विभागों के अफसरों-कर्मचारियों की मिलीभगत होती है। अवैध निर्माण की सूचना उस क्षेत्र में घूम रहा सुपरवाइजर सबसे पहले जीडीए के जूनियर इंजीनियर को देता है। जूनियर इंजीनियर तुरंत उस बिल्डर से ‘डील’ करता है। पहले प्रति मंजिल एक से दो लाख की डीलिंग होती थी, जिसमें उस बिल्डिंग को न तोड़े जाने की गारंटी होती थी। लेकिन अब प्रति मंजिल तीस हजार में सौदा हो जाता है लेकिन इसमें बिल्डिंग के तोड़े जाने की गारंटी नहीं होती। यह पैसा संबंधित विभागों में ईमानदारी से पद क्रमानुसार सभी को वितरित किया जाता है।

शाहबेरी दुर्घटना के बाद भी घिसीपिटी भारतीय प्रशासनिक परंपरा सदा की तरह दोहराई जाएगी। कुछ गिरफ्तारियां होंगी, कुछ तबादले होंगे, मरने वालों और घायलों के लिए मुख्ममंत्री पहले संवेदना प्रकट करेंगे और फिर मुआवजा राशि की घोषणा करेंगे। एक जांच समिति भी बैठ सकती है, जो अपनी रिपोर्ट कभी देगी ही नहीं या देगी तो इतने वर्ष बाद कि लोग भूल चुके होंगे कि कभी यह दुर्घटना हुई भी थी! यह एक शाश्वत परंपरा की तरह हम भारतीयों के समाज और देश में ‘चलता’ रहता है। इस तरह की घटनाएं हम भारतीयों के जीवन में सामान्यत: चलती ही रहती हैं और भविष्य में भी चलती रहेंगी!
’निर्मल कुमार शर्मा, प्रताप विहार, गाजियाबाद

मौत की खिड़की
छत्तीसगढ़ के रायपुर में एक दंपति अपने मासूम बच्चे का इलाज कराने एंबुलेंस से अस्पताल पहुंचा। अस्पताल के द्वार पर पहुंचने के बावजूद एंबुलेंस का दरवाजा काफी मशक्कत के बाद भी नहीं खुला। लाचार पिता ने जब एंबुलेंस की खिड़की का शीशा तोड़ने की कोशिश की तो उसे यह कर रोक दिया गया कि ‘सरकारी संपत्ति’ को नुकसान मत पहुंचाओ। काफी समय बीतने के बाद आखिर खिड़की का शीशा तोड़ कर ही बच्चे को बड़ी मुश्किल बाहर निकला गया। लेकिन इस सबमें काफी देर हो चुकी थी और दुर्भाग्यवश माता-पिता के सामने ही बच्चा दम घुटने से चल बसा। ‘सरकारी संपत्ति’ तो बचा ली गई लेकिन उन माता-पिता की संपत्ति का क्या? कुछ निर्णय परिस्थितियों को देख कर भी लिए जाने चाहिए। समय पर इलाज न मिले तो समझ आता है लेकिन मरीज एंबुलेंस में ठीक अस्पताल के सामने है और ऐसा हादसा! बहुत अफसोसनाक है यह।
’दीपा डिंगोलिया, राजनांदगांव

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