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चौपाल: सीवर में मौत

देशभर में होने वाली इन बेहद दुखद घटनाओं से संबंधित खबरें मीडिया में सुर्खी बन कर खत्म हो जाती हैं। सीवर के भीतर पैदा होने वाली जहरीली गैसों के अलावा कई बार सीवर लाइन और सेप्टिक टैंकों में कीचड़ और दलदलनुमा विकट स्थितियां होने से सफाई का काम करने वाले लोग उसमें धंस कर मौत के मुंह में चले जाते हैं।

Author September 24, 2018 6:17 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।(Express Photo by Manoj Kumar)

हमारे शहरों की सीवर लाइनें सफाई कर्मचारियों का दम घोंट रही हैं। दिल्ली हो या मुंबई या फिर कोई अन्य शहर, सीवर सफाईकर्मियों की मौतों की फेहरिस्त साल-दर-साल लंबी होती जा रही है। लगातार होतीं ये मौतें समाज और सरकार के लिए चिंता का विषय हैं। जहरीली गैसों से भरी इन गहरी सुरंगनुमा लाइनों की सफाई करने वालों की सुरक्षा के प्रति हमारी पूरी व्यवस्था ही घोर लापरवाही से ग्रस्त है। सितंबर की शुरुआत में ही दिल्ली में सीवर की सफाई के लिए उतरे पांच में से चार लोगों की दम घुटने से दर्दनाक मौत हो गई। अब ऐसी घटनाओं की शृंखला-सी बन गई है।

देशभर में होने वाली इन बेहद दुखद घटनाओं से संबंधित खबरें मीडिया में सुर्खी बन कर खत्म हो जाती हैं। सीवर के भीतर पैदा होने वाली जहरीली गैसों के अलावा कई बार सीवर लाइन और सेप्टिक टैंकों में कीचड़ और दलदलनुमा विकट स्थितियां होने से सफाई का काम करने वाले लोग उसमें धंस कर मौत के मुंह में चले जाते हैं। गहरे अंधेरे सीवर और गटर मौत के चैंबरों में तब्दील होते जा रहे हैं। देशभर में लाखों सफाईकर्मी हर रोज अपनी जान जोखिम में डाल कर सीवर और गटरों को साफ करते हैं। इनमें से अधिकांश तो नगर निकायों में ठेके पर काम कर रहे होते हैं। बेहद गरीबी और आजीविका के अभाव के चलते ही वे यह काम करने पर विवश होते हैं। सुप्रीम कोर्ट कई बार सरकारों को इस तरह के काम में लगे लोगों की समस्याओं पर ध्यान देने की हिदायत दे चुका है लेकिन हालात ज्यों के त्यों हैं।

असल में इस पेशे में लगे लोगों की जिंदगियों पर इस काम में होने वाली लापरवाहियों से और भी कई दुष्प्रभाव पड़ते हैं। चूंकि सफाई करते वक्त वे किसी प्रकार के मास्क या दस्तानों, जूतों आदि का उपयोग नहीं करते इसलिए गंदगी के सीधे-सीधे संपर्क से उन्हें कई तरह की लाइलाज बीमारियां हो जाती हैं। कुछ समय पहले हुए एक सर्वे में बताया गया था कि सीवर की सफाई में लगे लोगों में से 49 फीसद को सांस संबंधी तकलीफें और ग्यारह प्रतिशत से अधिक को त्वचा संबंधी अनेक परेशानियां हो जाती हैं। इनसे काम लेने वाली संस्थाएं, जैसे कि नगर निगम और स्थानीय परिषदें भी इस तरफ से अनजान बनी रहती हैं। इस तरह के काम में लगे लोगों को मजूदरी भी बहुत कम मिलती है। जो सफाईकर्मी सरकारी व्यवस्था में होते हैं उनके बारे में मान लिया जाता है कि वे इस काम में पारंगत होते हैं। लिहाजा, उनके प्रति रवैये में कोई बदलाव नहीं दिखता। उनके लिए बीमा और अन्य सुविधाओं की तरफ नियोक्ता ध्यान ही नहीं देते। इस तरह की घटनाओं में मरने वालों के लिए पर्याप्त मुआवजे की व्यवस्था होने के बावजूद उनके आश्रित भटकने पर मजबूर रहते हैं। सीवरों की सफाई मशीनों से कहीं भी नहीं की जा रही। अदालतों समेत मानवाधिकार आयोग भी इन कामगारों की समस्याओं पर चिंता जता चुका है। अब जबकि देश स्वच्छ भारत मिशन मोड में चल रहा है फिर भी सफाईकर्मियों की जिंदगी के प्रति सरकार का रवैया गंभीर नहीं दिखता।
’संदीप भट्ट, खंडवा, मध्यप्रदेश

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