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चौपाल: न्याय का हक

छोटे-छोटे अपराधों में फंसे ऐसे विचाराधीन कैदियों की संख्या दो लाख बयासी हजार आठ सौ उन्यासी है, जो इतने गरीब हैं कि उनके पास अपनी जमानत कराने या मुकदमा लड़ने के लिए वकील की फीस के लिए भी पैसा नहीं है।

Author May 19, 2018 4:01 AM
भारतीय जेलों में सजा पाए कैदियों की संख्या एक लाख इकतीस हजार पांच सौ सत्रह है। सांकेतिक फोटो

भारत सरकार के संस्थान राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार भारत की जेलों में इस समय कुल चार लाख अठारह हजार पांच सौ छत्तीस कैदी हैं। इनमें छोटे-छोटे अपराधों में फंसे ऐसे विचाराधीन कैदियों की संख्या दो लाख बयासी हजार आठ सौ उन्यासी है, जो इतने गरीब हैं कि उनके पास अपनी जमानत कराने या मुकदमा लड़ने के लिए वकील की फीस के लिए भी पैसा नहीं है। भारतीय जेलों में सजा पाए कैदियों की संख्या एक लाख इकतीस हजार पांच सौ सत्रह है। अगर कोई अपराध सरगना या कोई सफेदपोश मुजरिम जेल अधिकारियों की मुट्ठी गरम करने को तैयार है तो वह जेल परिसर के भीतर मोबाइल फोन, शराब और हथियार तक रख सकता है जबकि दूसरी ओर सामाजिक-आर्थिक तौर पर पिछड़े हुए विचाराधीन कैदियों को सरकारी तंत्र द्वारा उनकी बुनियादी गरिमा से भी वंचित रखा जाता है। आखिर यह कौन सा न्याय है कि एक तरफ धनाभाव के कारण लाखों गरीब जमानत न मिलने, जजों की कमी, अदालतों पर काम के बोझ आदि अनेक तथाकथित कारणों से जेलों में सड़ रहे हैं तो दूसरी तरफ पैसे वालों, नेताओं और माफियाओं के लिए जमानत का रास्ता दिनों नहीं, बल्कि घंटों में प्रशस्त हो जाता है। उनके लिए न मुकदमों की अधिकता, न जजों की कमी आड़े आ रही है। देश में न्याय पर सभी का हक होना चाहिए न कि न्याय केवल अमीरों के लिए आरक्षित हो!
निर्मल कुमार शर्मा, प्रताप विहार, गाजियाबाद

गांधी के सहारे
महात्मा गांधी को सन 1893 में दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों द्वारा रंगभेद रवैये के कारण ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डिब्बे से जबरदस्ती उतारा गया था। इस घटना के 125 वर्ष पूरे होने पर जोहानिसबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) में समारोह आयोजित किया गया है जिसमें विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के अतिरिक्त अनेक गणमान्य लोग शिरकत करेंगे। गांधीजी की जागृत चेतना ने अपने अपमान को समूचे देश और कौम के अपमान के साथ जोड़ कर जो जागृति यात्रा शुरू की थी उसे हम अपने गौरवपूर्ण इतिहास के रूप में याद करते हैं परंतु आज यह ‘नॉस्टैल्जिया’ के अलावा कुछ नहीं है। हम कब तक इतिहास के महान और अद्वितीय व्यक्तित्वों और घटनाओं के सहारे स्वयं को गौरवान्वित करते रहेंगे? आज देश की स्थिति और व्यवस्था के यथार्थ की ओर ध्यान देना भी उतना ही आवश्यक है जितना इतिहास की महानता को पूजना। महात्मा गांधी के त्याग और बलिदान से हम तब तक उऋण नहीं हो सकते, जब तक हर देशवासी के लिए सम्मानपूर्ण और पक्षपातरहित जीवन के उनके आदर्श को पूरा नहीं कर देते। यह तभी संभव होगा जब सरकार का ध्यान व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता को जड़ से उखाड़ फेंकने पर केंद्रित होगा। अन्यथा अकेले गांधी नाम के देशराग पर रीझने का कोई लाभ नहीं होगा।
’सुमन, प्लेटिनम एनक्लेव, रोहिणी, दिल्ली

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