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चौपाल: बेमानी मुद्दे

जिन लोगों ने देश की गरीब जनता की कभी कोई भलाई की, उन्हें ही संत कहा जाना चाहिए। किसी भी मजहब के महंथों ने क्या कभी सोचा है कि इस देश के लोग इतने गरीब क्यों हैं? देश के करोड़ों लोग भूखे क्यों सो जाते हैं? यहां इतनी अशिक्षा क्यों है?

Author November 7, 2018 6:08 AM
(प्रतीकात्मक तस्वीर

हाल में संत समाज के रूप में जाने वाले लोगों ने सामूहिक रूप से ‘धर्मादेश संत महासम्मेलन’ आयोजित करके इस सरकार को 2019 के चुनाव रूपी वैतरणी पार कराने के लिए अयोध्या में भव्य राम मंदिर अतिशीघ्र बनाने की वकालत की। इसके जरिए सरकार को ‘आदेश दिया गया’ कि राम मंदिर के लिए वह कानून लाए या अध्यादेश, यही है धमार्देश! अब देश की जनता का सरकार से प्रश्न है कि 2014 के चुनाव के पहले अगर यही इकलौता मुद्दा मंदिर बनाना था तो अपने पिछले साढ़े चार साल के शासन-काल में अयोध्या में मंदिर बनाने से उसे किसने रोका था! दरअसल, पिछला साढ़े चार साल का समय इस सरकार ने व्यर्थ में बिता दिया। जनहित के मुद्दे पर केवल बात होती रही, जमीनी स्तर पर कुछ नहीं हुआ। अब आसन्न 2019 के चुनावों में जनता के पास जाने में यह सरकार और इसके नेता डर रहे हैं। इसलिए उन्होंने फिर वही मंदिर राग अलापना शुरू कर दिया है।

श्रीश्री रविशंकर जैसे अमीरों के कथित संत और अन्य धर्माचार्यों से देश की जनता पूछना चाहती है कि इस देश में वास्तविक सवाल क्या हैं! एक सर्वेक्षण कराया जाए कि लोग रोजगारपरक शिक्षा, गरीबी हटाने, अस्पतालों की स्थिति में सुधार, डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने और दवाइयों की गुणवत्ता और उपलब्धता सुधारना चाहते हैं, किसानों की आत्महत्या के कारणों का निदान चाहते हैं या फिर मंदिर बनवाना चाहते हैं! इस सर्वेक्षण के बाद ही यह कहा जाना चाहिए कि देश के लोग क्या चाहते हैं! अपनी ओर से मनगढ़ंत और निरर्थक बातें न की जाएं।

जिन लोगों ने देश की गरीब जनता की कभी कोई भलाई की, उन्हें ही संत कहा जाना चाहिए। किसी भी मजहब के महंथों ने क्या कभी सोचा है कि इस देश के लोग इतने गरीब क्यों हैं? देश के करोड़ों लोग भूखे क्यों सो जाते हैं? यहां इतनी अशिक्षा क्यों है? इतने बच्चे कुपोषित क्यों हैं? इतनी गर्भवती महिलाएं रक्त की कमी से क्यों जूझ रही हैं? यहां इतनी अधिक आर्थिक असमानता क्यों हैं? लाखों की संख्या में किसान आत्ममहत्या क्यों कर चुके हैं और अभी भी कर रहे हैं? वास्तविकता यह है कि कुछ अकर्मण्य लोग बगैर कोई काम किए समाज पर धर्म, आडंबर और मंदिर-मस्जिद के नाम पर अपना हित सुनिश्चित करना चाहते हैं। धर्म के नाम पर मंदिर-मस्जिद का व्यवसाय फलता-फूलता रहता है और जनता अंधविश्वासों में वास्तविक सवालों पर सोचने से दूर रहती है। शायद इस तरह के मुद्दों को उछालने का मकसद यही होता है।
’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

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