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चौपाल: सवालों का आधार

सुप्रीम कोर्ट ने जहां एक तरफ पैन कार्ड को आधार नंबर से जोड़ना, आयकर रिटर्न भरने के लिए आधार लिंक करना और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए आधार कार्ड जरूरी कर दिया है।

Author September 29, 2018 6:19 AM
आधार कार्ड (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

सर्वोच्च न्यायालय का आधार कार्ड पर दिया गया फैसला कुछ ऐसा ही है जैसे ‘सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी’। दरअसल, इस महत्त्वपूर्ण फैसले से न तो किसी पक्ष की हार हुई है और न किसी की जीत। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों के संविधान पीठ के 4-1 के बहुमत से दिए फैसले ने देश के नागरिकों की आधार संबंधी कुछ परेशानियों को दूर करने का काम जरूर किया है। सुप्रीम कोर्ट ने जहां एक तरफ पैन कार्ड को आधार नंबर से जोड़ना, आयकर रिटर्न भरने के लिए आधार लिंक करना और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए आधार कार्ड जरूरी कर दिया है वहीं दूसरी ओर नागरिकों को आधार कार्ड के कारण होने वाली रोजमर्रा की उलझनों जैसे बैंक खाते को आधार से जोड़ना, सिम कार्ड लेने के लिए आधार की आवश्यकता और स्कूलों में दाखिले के लिए आधार की जरूरतें खत्म करने का जो काम किया है उससे लोगों को निश्चय ही राहत मिलेगी। कोर्ट के फैसले के बाद यह बात तो जाहिर हो ही गई है कि भले ही कुछ सेवाओं के लिए आधार कार्ड की अनिवार्यता समाप्त हो चुकी है लेकिन यह कार्ड हर नागरिक के लिए जरूरी है।

इस फैसले ने कई नए सवालों को भी जन्म दिया है। पहला, जिन उपभोक्ताओं के आधार नंबर उनके मोबाइल नंबर से जुड़े गए हैं वे क्या बंद हो जाएंगे? दूसरा, गरीबों को सरकार द्वारा मिलने वाली सेवाओं का लाभ उठाने के लिए आधार अनिवार्य हो चुका है और अब अगर किसी गरीब को आधार कार्ड न होने के कारण रियायती दरों पर अनाज से लेकर दूसरी मूलभूत सुविधाओं से दूर रखा जाता है तो क्या यह उसके मौलिक अधिकार का हनन नहीं है? आधार को लेकर 1448 पन्नों के फैसले ने नौ साल से चल रहे ‘निजता के अधिकार के उल्लंघन’ के सवालों को दूर कर दिया है मगर आधार की सुरक्षा पर लगे किंतु-परंतु पूरी तरीके से खत्म नहीं हुए हैं।

बहुमत के फैसले से असहमति जताते हुए न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़ ने आधार को लोकसभा में धन विधेयक की श्रेणी में पेश किए जाने पर विरोध जताते हुए यह साफ जाहिर किया है कि आधार कानून विधेयक धन विधेयक से काफी अलग है। इस मुद्दे पर जरूरी है कि सरकार गंभीरता से सोचे क्योंकि मौजूदा समय में सरकार कुछ विधेयकों को धन विधेयक का रूप देकर लोकसभा से पारित कर कानून बनाने का काम करती है। इसे रोकना बेहद जरूरी है वरना बहुत सारे विधेयक राज्यसभा में नहीं पहुंचने के कारण न तो उन पर बहस होती है और न कभी चर्चाओं में आते हैं। यह द्विसदनीय संसद के मूलभूत ढांचे को कहीं न कहीं कमजोर करने वाला है और लोकतंत्र के लिए भी सही नहीं है।
’पीयूष कुमार, नई दिल्ली

फोटो के बिना
कुछ राज्य सरकारें अपनी विभिन्न योजनाओं से संबंधित विज्ञापनों में प्रधानमंत्री का फोटो दे रही हैं जो कि अनुचित है। किसी राज्य सरकार को प्रधानमंत्री की चापलूसी नहीं करनी चाहिए। प्रधानमंत्री को खुद सभी राज्य सरकारों को निर्देश देने चाहिए कि वे अपनी योजनाओं के लिए उनके फोटोका प्रयोग न करें। सरकारी खर्च पर किसी नेता की छवि चमकाने का प्रयास नहीं किया जाना करना चाहिए।
’जीवन मित्तल, मोती नगर, नई दिल्ली

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