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चौपाल: कर्नाटक की बिसात

भाजपा ने भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटाया तो नाराज लिंगायत समुदाय ने भाजपा से मुंह मोड़ लिया। अब एक बार फिर भाजपा के येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की वजह यह है कि लिंगायत समाज में उनका मजबूत जनाधार है।

Author March 28, 2018 4:37 AM
कर्नाटक के मुख्‍यमंत्री सि‍द्धारमैया। (फाइल फोटो)

कर्नाटक उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश नागामोहन दास समिति की सिफारिशें मानते हुए राज्य के कांग्रेस मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने लिंगायुत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा देना स्वीकार कर लिया है। राज्य सरकार ने समिति की लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यक वर्ग का दर्जा देने की सिफारिश भी मंजूर कर ली है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पहले लिया गया यह निर्णय मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की तुरुप चाल माना जा रहा है। प्रदेश में लिंगायत समाज अगड़ी जातियों में शामिल है। इस समुदाय के लोगों की संख्या करीब अठारह प्रतिशत है। यह भाजपा का पारंपरिक वोट बैंक माना जाता रहा है। अब लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा देकर सिद्धारमैया ने भाजपा के इस परंपरागत वोटबैंक में सेंध लगाने का प्रयास किया है।

आजादी के बाद से ही कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत समुदाय का वर्चस्व रहा है। 1989 में एक विवाद के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरेंद्र पटेल को सत्ता से हटा दिया था, तब लिंगायत समुदाय कांग्रेस का साथ छोड़कर जनता दल के रामकृष्ण हेगड़े के समर्थन में आ गया था। हेगड़े के निधन के बाद बीएस येदियुरप्पा लिंगायत समुदाय के नेता बने। लेकिन भाजपा ने भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटाया तो नाराज लिंगायत समुदाय ने भाजपा से मुंह मोड़ लिया। अब एक बार फिर भाजपा के येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की वजह यह है कि लिंगायत समाज में उनका मजबूत जनाधार है।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो फिलहाल लग रहा है कि सिद्धारमैया के निर्णय से राज्य के आगामी विधानसभा में कांग्रेस को फायदा होगा। कांग्रेस का अनुमान है कि अब लिंगायत समुदाय के मतदाता विधानसभा चुनाव में उसके ही समर्थन में मतदान करेंगे, जबकि दूसरी ओर वीरशैव समुदाय के लोग कांग्रेस के इस निर्णय का भारी विरोध कर रहे हैं। इसके साथ ही लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा देने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेज कर कांग्रेस ने भाजपा को उलझन में डाल दिया है। इस निर्णय से भाजपा के सामने धर्मसंकट खड़ा हो गया है।

केंद्र यदि कर्नाटक सरकार के इस निर्णय पर मुहर लगाता है तो फायदा कांग्रेस को होगा और यदि उसका विरोध करता है तो भी फायदा कांग्रेस को ही होगा। धर्म का उपयोग राजनीति में नहीं होना चाहिए। इसके बावजूद धर्म और राजनीति का घालमेल सदियों से होता आ रहा है। राजनीतिक दल वोटबैंक की खातिर इसे बढ़ावा देते रहे हैं। हर धर्म और वर्ग के लोग अपना प्रभुत्व चाहते हैं। यह सच है कि धर्म सत्ता प्राप्ति का भावपरक जरिया है, पर यह नीतिगत विकास की राह में अड़चन है।
’कुशाग्र वालुस्कर, भोपाल, मध्यप्रदेश

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