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चौपाल: न्याय का तकाजा

सजा तो निर्भया कांड के बाद उसके गुनहगारों को भी दी गई थी। नया कानून बनाया गया था और उस कानूनों के तहत दोषियों को सजा भी सुनाई गई।

Author April 19, 2018 12:49 PM

सोशल मीडिया पर लोग फिर से एक दिन के लिए ‘कठुआ गैंगरेप पीड़िता’ वाली प्रोफाइल फोटो लगाएंगे, ‘स्टेटस’ पर सरकार के खिलाफ चार लाइनें लिखेंगे और फिर अगले दिन एक नई ‘सेल्फी’ इनकी प्रोफाइल की शोभा बढ़ाएगी। जैसे कि इनके एक दिन प्रोफाइल फोटो बदल लेने से पीड़िता के गुनहगारों को सजा मिल जाएगी और अगले दिन से लोग बलात्कार करने से भी डरेंगे…. क्योंकि कुछ भी होने पर हमारे देश के युवा सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपनी प्रोफाइल फोटो बदल कर क्रांति लाते हैं! हमारे देश की आधी आबादी तो ऐसी है जिसे इन सब चीजों से कोई फर्क नहीं पड़ता। वह इन बातों में पड़ना नहीं चाहती। और बची हुई आधी आबादी को ऐसा लगता है कि प्रोफाइल फोटो बदल लेने भर से देश में क्रांति आ जाएगी! सजा तो निर्भया कांड के बाद उसके गुनहगारों को भी दी गई थी। नया कानून बनाया गया था और उस कानूनों के तहत दोषियों को सजा भी सुनाई गई। पर क्या हमारे देश की कानून व्यवस्था इतनी लचर है कि कोई गुनाह करने से भी नहीं डरता! सही मायने में अगर हम निर्भया और पीड़िता को इंसाफ दिलाना चाहते हैं तो यह सुनिश्चित करना होगा कि अगली बार से कोई और मासूम पीड़िता या निर्भया न बने…गली के नुक्कड़ पर खड़े होकर कोई वहां से गुजरती लड़कियों के कपड़ों के अंदर झांकने की कोशिश न करे!
’ अंकिता, नोएडा

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खेलों में हम
आस्ट्रेलिया के गोल्डकोस्ट शहर में हुए इक्कीसवें राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का प्रदर्शन औसत रहा। 2010 की तुलना में इसे फीका कहा जाएगा। तब हमें 101 पदक मिले थे, इस बार 66 पर सिमट गए। आस्ट्रेलिया 197 और इंग्लैंड 136 पदकों के साथ क्रमश: पहले और दूसरे पायदान पर रहे। वैसे हमारी यह उपलब्धि भी कम नहीं है क्योंकि इन खेलों में इकहत्तर देशों ने भाग लिया, जिसमें हम तीसरे पायदान पर आए। फिर भी हमें अपनी खेल नीतियों पर पुनर्विचार करना पड़ेगा कि कैसे आस्ट्रेलिया, जिसका आबादी महज ढाई करोड़ है और इंग्लैंड, जिसकी साढ़े छह करोड़ है, का प्रदर्शन हमसे कई गुना अच्छा रहा। सवा अरब से ज्यादा जनसंख्या वाला मुल्क होते हुए भी हमारा प्रदर्शन विकसित देशों की तुलना में कमतर रहा है। हमने सभी राष्ट्रमंडल खेलों में कुल मिला कर अब तक पांच सौ से अधिक पदक प्राप्त किए हैं लेकिन ओलंपिक खेलों में हमारी स्थिति बहुत दयनीय है। चौबीस आयोजनों में केवल अट्ठाईस पदक! जब तक देश की अधिकांश आबादी मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहेगी तब तक खेल जगत में हम औरों से पिछड़े ही रहेंगे।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी

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