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चौपाल : अंकों का खेल

आज जिस तरीके से मूल्यांकन प्रणाली को उदार बना कर सीबीएसी 499 अंक देकर वाहवाही लूट रहा है वह निश्चय ही हतोत्साहित करने वाला है। किसी विचारक ने ठीक ही कहा है कि न्यूनतम योग्यता रखने वाला भी प्रदर्शन प्रिय होता है।

Author June 1, 2018 3:51 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

इन दिनों विभिन्न शिक्षा बोर्डों के बीच परीक्षार्थियों को ज्यादा से ज्यादा अंक देने की जैसी होड़ मची हुई है उसे देखते हुए लगता है कि अब केवल अंकों से शैक्षणिक गुणवत्ता को मापा जाएगा। आज जिस तरीके से मूल्यांकन प्रणाली को उदार बना कर सीबीएसी 499 अंक देकर वाहवाही लूट रहा है वह निश्चय ही हतोत्साहित करने वाला है। किसी विचारक ने ठीक ही कहा है कि न्यूनतम योग्यता रखने वाला भी प्रदर्शन प्रिय होता है। आज युवाओं के बौद्धिक स्तर में गिरावट आती जा रही है। उनकी तर्क क्षमता निरंतर घट रही है और रटंत विद्या भारी पड़ रही है। मूल्यों में गिरावट महसूस की जा रही है। नौकरियों के लिए अंकों का यह खेल शिक्षा व्यवस्था में घुन का काम कर रहा है। इसे देखते हुए वह दिन दूर नहीं जब समूची शिक्षा व्यवस्था में विकृति पैदा हो जाए। अंकों के खेल में शिक्षा बोर्ड प्रतिस्पर्धी बने रहे तो गुणवत्ता की परख कौन करेगा? जिस उद्देश्य से बोर्डों का गठन किया गया था उस पर वे कितने खरे उतर रहे हैं इस पर भी पैनी नजर रखने की जरूरत है।
’रूपश्री, बीबीएयू, लखनऊ

दमन की तूती
तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले में वेदांता स्टरलाइट तांबा संयंत्र के भयंकर प्रदूषण से क्षुब्ध लोगों ने जबर्दस्त विरोध प्रदर्शन किया जिस पर पुलिस की गोलीबारी से एक दर्जन से अधिक लोग मारे गए। आजकल सर्वत्र प्रदूषण से मुक्ति के लिए प्रचार किया जा रहा है। क्या यह प्रदूषण केवल घरों से निकले कचरे और कूड़े तक सीमित है? वैज्ञानिकों के अनुसार तांबा परिशोधन करने में सर्वाधिक विषाक्त प्रदूषक निकलते हैं, जो समस्त जीवों, हवा, पानी और पर्यावरण को प्रभावित करते हैं। वेदांता कंपनी की विश्वसनीयता पहले से ही दुनिया भर में संदिग्ध है। यह भयंकर प्रदूषण फैलाने के लिए बदनाम रही है। तूतीकोरिन में इस कंपनी के संयंत्र की स्थापना से पूर्व महाराष्ट्र, गोवा और गुजरात ने इसे अपने यहां कारखाना लगाने से मना कर दिया था। प्रदूषण फैलाने वाली कंपनी के खिलाफ लोग प्रदर्शन कर रहे थे, तो यह सरकार के प्रदूषण मुक्त भारत अभियान के पक्ष में ही था। फिर इन प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का क्या औचित्य है? हमारी जनता द्वारा चुनी गई ये सरकारें अपने को लोकतांत्रिक कहतीं हैं, पर इनके क्रियाकलाप तो एकदम अलोकतांत्रिक और दमनकारी हैं। ये अपने विरोधियों को न्यायोचित मांग पर भी गोलियों से भून देती हैं। यह बहुत ही दुखद और चिन्ताजनक है।
’निर्मल कुमार शर्मा, प्रताप विहार, गाजियाबाद

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