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चौपाल : विरोध का स्वरूप

पिछले दिनों अनुसूचित जाति/ जनजाति कानून में संशोधन के विरोध में कुछ दलित संगठनों ने भारत बंद का आह्वान किया था। जगह-जगह ट्रेनें रोकी गर्इं तो कहीं जाम की वजह से एंबुलेंस में बच्चे ने दम तोड़ दिया। इस सबके बाद पुलिस चौकियों को जलाया जाना तो सामान्य बात लगने लगती है।

Author June 1, 2018 3:49 AM
मौजूदा समय में विरोध का स्वरूप बदल गया है। किसी खास संगठन द्वारा किसी भी मुद्दे पर बंद का आह्वान कर दिया जाता है। बिना लोगों की तकलीफों को समझे बंदूक और डंडे की दहशत दिखा कर बाजार बंद करा दिए जाते हैं।( बिहार के हाजीपुर में प्रदर्शन के दौरान की प्रतीकात्मक तस्वीर)

लोकतंत्र में किसी मुद्दे पर विरोध व्यक्त किया जाना जायज है। जब तक जनता किसी मसले पर सरकार के सामने विरोध नहीं करेगी तब तक वह लोकतंत्र लगभग अधूरा रहेगा। और जब यह विरोध खत्म हो जाएगा तो वह लोकतंत्र तानाशाही में परिवर्तित होने लगेगा। लेकिन प्रश्न है कि विरोध का स्वरूप कैसा हो? मौजूदा समय में विरोध का स्वरूप बदल गया है। किसी खास संगठन द्वारा किसी भी मुद्दे पर बंद का आह्वान कर दिया जाता है। बिना लोगों की तकलीफों को समझे बंदूक और डंडे की दहशत दिखा कर बाजार बंद करा दिए जाते हैं। क्या गांधी के इस देश में लोग अपनी मांगें मनवाने के लिए गांधीजी का अनुसरण करते हैं? क्या गांधीजी ने इस प्रकार के विरोध की परिकल्पना की थी? उन्होंने तो सनिवय अवज्ञा अथवा भूख हड़ताल को विरोध का सबसे उचित तरीका बताया था। उनके अनुसार विरोध का मतलब दूसरे पर अत्याचार न करके खुद को पीड़ा देना था। हुकूमत को यह दिखा देना था कि हम इस पीड़ा को भी सहन कर सकते हैं। लेकिन गांधी के सत्याग्रह के इस आदर्श का अमुसरण जनता भी क्यों करे जब हमारे नेता ही अपनी सुविधानुसार उनके नाम का फायदा उठाते हैं। एक पार्टी गांधीजी के कथित कांग्रेस मुक्त भारत के सपने को साकार करने में लगी हुई है तो दूसरी पार्टी भर-पेट खाकर उपवास की औपचारिकता पूरी कर रही है!

पिछले दिनों अनुसूचित जाति/ जनजाति कानून में संशोधन के विरोध में कुछ दलित संगठनों ने भारत बंद का आह्वान किया था। जगह-जगह ट्रेनें रोकी गर्इं तो कहीं जाम की वजह से एंबुलेंस में बच्चे ने दम तोड़ दिया। इस सबके बाद पुलिस चौकियों को जलाया जाना तो सामान्य बात लगने लगती है। फिल्म ‘पद्मावत’ के विरोध में भी एक समुदाय के लोग भारत बंद के नाम पर हिंसा करने को आमादा हो गए थे। स्कूली बच्चों से भरी बस पर पत्थर बरसाए गए थे।क्या यही है विश्व को शांति का संदेश देने भारत के लोगों का विरोध करने का सही तरीका? इस सबमें राजनीतिक पार्टियों की भूमिका पर क्या बात करें! वे तो इन उग्र विरोधियों को रोकने के बजाय अपने-अपने हिसाब से वोटबैंक साधने में लग जाती हैं। किसी को दलित वोट याद आ जाता है तो कोई अपने सवर्ण वोटों को बचाने की फिराक में लग जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में बस उस आम जनता का प्रशासन पर से भरोसा उठ जाता है जो इस विरोध में शामिल नहीं होता है। एक समय था जब दिल्ली का जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शन का अड्डा था। हर समय वहां किसी न किसी मुद्दे को लेकर विरोध किया जाता था। लेकिन आज वह जगह लोगों के शांतिपूर्वक विरोध की आहट तक सुनने के लिए व्याकुल है। बहरहाल, इन सब बातों के बरक्स एक प्रश्न का जवाब देना मुश्किल हो जाता कि क्या वाकई आज भारत के लोग शांतिपूर्ण विरोध में विश्वास नहीं रखते या फिर हमारी हुकूमत के कानों में ही गांधीजी के तरीके से होने वाले सत्याग्रह की आवाज नहीं पहुंचती है?
’आशीष झा, सुपौल, बिहार

जलते जंगल
उत्तराखंड के जंगलों में लगी भयंकर आग लगातर गंभीर होते पारिस्थितिकीय असंतुलन का परिणाम भी है। प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन, पड़ों का अंधाधुध कटान, दिनोंदिन गहराता प्रदूषण आदि पारिस्थितिकीय असंतुलन के मुख्य कारण हैं जिनकी वजह से ग्लोबल वार्मिंग, गर्मी जल्दी आना व ज्यादा पड़ना और सर्दी कम समय के लिए पड़ना व पतझड़ में अत्यधिक तापमान होना आदि कारणों से सामान्य आग विकराल रूप ले लेती है। यह पूरी मानव जाति के लिए चेतावनी है कि अगर वन संरक्षण के लिए गंभीरता से कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियों के लिए पृथ्वी पर जीवन असंभव हो जाएगा।
’सुनील कुमार सिंह, मेरठ

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