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चौपाल: परेशानी की परीक्षा

परीक्षा केंद्र 1500 से 2000 किलोमीटर दूर बनाए गए हैं। इससे लाखों परीक्षार्थियों की परेशानी बढ़ गई है। एक तो यह परीक्षा चार वर्ष बाद हो रही है। बताया जा रहा है कि रेलवे ने परीक्षा शुल्क वापस न करने का उपाय ढूंढ़ने के लिए ऐसा बेतुका और गैर जिम्मेदाराना फैसला लिया है।

Author August 3, 2018 2:41 AM
तस्वीर का प्रयोग प्रतीक के तौर पर किया गया है। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

भारत में बेरोजगारी का आलम यह है कि किसी भर्ती में पदों की संख्या तो सैकड़ों में होती है पर आवेदनों की संख्या लाखों में। कभी-कभार तो यह लाखों तक पहुंच जाती है। उस पर भी भर्ती करने वाली संस्थाएं अगर सही ढंग से भर्ती न करें तो यह प्रतियोगी परीक्षार्थियों के साथ खिलवाड़ ही कहलाएगा। कुछ ऐसा ही हाल है रेलवे द्वारा होने वाली सहायक लोको पायलट तथा तकनीशियन की परीक्षा का। इसके परीक्षा केंद्र 1500 से 2000 किलोमीटर दूर बनाए गए हैं। इससे लाखों परीक्षार्थियों की परेशानी बढ़ गई है। एक तो यह परीक्षा चार वर्ष बाद हो रही है। बताया जा रहा है कि रेलवे ने परीक्षा शुल्क वापस न करने का उपाय ढूंढ़ने के लिए ऐसा बेतुका और गैर जिम्मेदाराना फैसला लिया है।

इससे हजारों की संख्या में छात्र चाह कर भी परीक्षा केंद्र पर पहुंच ही नहीं पाएंगे। मूल प्रश्न यही है कि अगर परीक्षा ऑनलाइन है तो बक्सर जिले के छात्र को चेन्नई क्यों जाना पड़े या आरा जिले के छात्र को हैदराबाद क्यों जाना पड़े? इतनी दूर परीक्षा केंद्र बनाने का क्या अर्थ है? उसे अपने जिले या आसपास के जिले में परीक्षा केंद्र क्यों नहीं आवंटित किया जा रहा है?
रेलवे ही नहीं, वर्तमान में प्रदेश की लगभग सभी नियोक्ता संस्थाएं किसी न किसी तरीके से परीक्षार्थियों का शोषण करने में लगी हुई हैं। हाल ही में संपन्न हुई एलटी ग्रेड की परीक्षा में अंतिम क्षणों में परीक्षा केंद्र का बदला जाना, एक ही परीक्षार्थी के दो-दो एडमिट कार्ड आना, पीसीएस जैसी उच्च स्तरीय परीक्षा में गलत प्रश्नपत्र का बांटा जाना इन संस्थाओं की नाकामी और अफसरों की लापरवाही को बतलाता है। इस मामले में यूपीएससी की तरह निरापद कार्य शैली को अपनाया जाना चाहिए जिससे पिछले चार साल से परीक्षा की तैयारी कर रहे लाखों प्रतिभाशाली छात्रों के साथ न्याय हो सके।
’देवानंद, दिल्ली

न्याय की शरण
कानून मंत्री ने लोकसभा में कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट का काम जनहित याचिकाओं के माध्यम से सरकार चलाना नहीं है। उनके मुताबिक जनता ने जिन्हें सरकार चलाने के लिए चुना है वे सदन के प्रति उत्तरदायी हैं और वे ही सरकार चलाएंगे। यह बिल्कुल सही भी है। लेकिन अदालतों का काम किसी भी जनहितैषी विषय पर संज्ञान लेते हुए सरकार को आवश्यक दिशानिर्देश देना भी है। न्यायपालिका और विधायिका के बीच संतुलन की व्यवस्था हमारे संविधान ने दी हुई है। इसी व्यवस्था में कार्यपालिका के साथ समन्वय भी शामिल है लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि जब कभी भी लोककल्याण के मुद्दों पर सरकारें विफल हुई हैं, न्यायपालिका ने आमजन के हितों का संरक्षण किया है। जब कभी भी जनसामान्य सरकार की व्यवस्था से थक-हार जाता है तब वह न्याय की शरण में जाता है और अदालतें इंसाफ करती भी हैं। यह बिल्कुल सही है कि अदालतें सरकार चलाने की व्यवस्था तो नहीं हैं लेकिन यह भी सच है कि न्यायपालिका ही लोगों के संवैधानिक हितों का संरक्षण कर सकती है। जब कभी भी सरकारें लोगों के हितों की अनदेखी करती हैं या उन्हें पूरा नहीं कर पातीं तब-तब न्यायपालिका ही भरोसा जगाती हैं।
’संदीप भट्ट, खंडवा, मध्यप्रदेश

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