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रेल बजट में हुई थी मानवरहित क्रॉसिंग बंद करने की बात, फिर क्यों हो रहे कुशीनगर जैसे हादसे

मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग की वजह से होने वाली दुर्घटनाओं के आंकड़े काफी चिंतनीय हैं। सरकारी रिपोर्ट है कि हर साल पंद्रह हजार से अधिक लोगों की जान मानवरहित क्रॉसिंग की वजह से चली जाती है। कई मामलों में लोग अपनी जल्दबाजी व लापरवाही के कारण हादसों के शिकार होते हैं।

इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है। (Express Photo by Nirmal Harindran)

चौपाल: हादसों का इंतजार

यह बहुत अफसोसनाक है कि मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग के कारण देश के विभिन्न भागों में अब तक कई दुर्घटनाएं हो चुकी हैं, लेकिन रेल मंत्रालय इनके बाबत अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाने में नाकाम रहा है। हर साल के बजट में मानवरहित क्रॉसिंग को लेकर चर्चा की जाती है, मगर इंतजामों में ढिलाई बरती जाती है। कुशीनगर हादसे के मामले में रेलवे का कहना है कि रेलवे क्रॉसिंग पर क्रॉसिंग-मित्र तैनात था, जिसने वैन चालक को गाड़ी रोकने के लिए कहा लेकिन उसने सुना नहीं और वैन आगे बढ़ा दी। कुशीनगर जैसा ही हादसा 2016 में भदोही में हुआ था जिसमें आठ स्कूली बच्चे मारे गए थे। तब भी दुख प्रकट करने और सांत्वना देने की औपचारिकता पूरी की गई थी। लेकिन दो साल में केवल हादसे की जगह और मृतकों की संख्या बदली है, हालात नहीं।

मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग की वजह से होने वाली दुर्घटनाओं के आंकड़े काफी चिंतनीय हैं। सरकारी रिपोर्ट है कि हर साल पंद्रह हजार से अधिक लोगों की जान मानवरहित क्रॉसिंग की वजह से चली जाती है। कई मामलों में लोग अपनी जल्दबाजी व लापरवाही के कारण हादसों के शिकार होते हैं। रेलवे फाटकों पर सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देशों की अवहेलना की जाती है। कोई भी रेल दुर्घटना संयोग मात्र नहीं, बल्कि लापरवाही से होती है। यात्रियों की सुरक्षा के साथ-साथ मानवरहित क्रॉसिंग पर सुरक्षा भी रेलवे की प्राथमिकताओं में शामिल होनी चाहिए। हाल ही में लखनऊ-कानपुर रूट के हरौनी स्टेशन पर अचानक कानपुर से लखनऊ आने वाली ट्रेन का प्लेटफार्म बदलने की घोषणा हुई। प्लेटफार्म नंबर तीन पर खड़े यात्रियों में प्लेटफॉर्म नंबर चार पर जाने की भगदड़ मच गई। इस अफरा-तफरी में पच्चीस साल के एक युवक की मौत हो गई और दो लोग घायल हो गए। यह भी कोई पहली घटना नहीं है, जब अचानक ट्रेन का प्लेटफार्म बदल दिया गया हो।

प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में 21 अप्रैल से 23 अप्रैल के बीच आठ ट्रेनों के प्लेटफार्म बदले गए जिससे यात्रियों में अफरा-तफरी तो मची, लेकिन कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई। शायद व्यवस्था सुधारने के लिए सरकार को और बहुत हद तक जनता को भी बड़े हादसों का इंतजार रहता है। रेल मंत्रालय की हर साल होने वाली घोषणाएं व नेताओं के वादे कभी पूरे होते नहीं देखे गए हैं। रेलवे तेज रफ्तार रेलगाड़ियां शुरू करने की बात करता है, बुलेट ट्रेन के सपने भी लोगों को दिखाए जा रहे हैं, लेकिन क्रॉसिंग के बारे में काम को आगे नहीं बढ़ाया जाता है। मानवरहित क्रॉसिंग बंद करने की बात 2011 के रेल बजट में भी की गई थी, लेकिन उस घोषणा पर अमल आज तक नहीं हुआ। अगर अमल होता तो कुशीनगर हादसा भी घटित नहीं होता।
’कुशाग्र वालुस्कर, भोपाल, मध्यप्रदेश

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