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चौपाल: नए दोस्त

भारत के पारंपरिक साथी रहे रूस की दिलचस्पी पाकिस्तान में बढ़ी है। इससे साफ संकेत मिलते हैं कि अगर भारत नए विकल्पों की तरफ रुख कर सकता है, तो रूस भी ऐसा कर सकता है। भारत क्षेत्रीय-अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपने लिए नई संभावनाएं खोज रहा है और इसमें अमेरिका की मदद ले रहा है।

Author May 12, 2018 04:51 am
भारत के पारंपरिक साथी रहे रूस की दिलचस्पी पाकिस्तान में बढ़ी है।

भारत और रूस की दोस्ती की मजबूत दीवार क्या अब दरक रही है? दक्षिण एशिया के दो महत्त्वपूर्ण देशों भारत और पाकिस्तान के दोस्त बदलने और पुराने दोस्तों से दूरियां बढ़ने के संकेत साफ दिख रहे हैं। पाकिस्तान और अमेरिका के संबंधों में कड़वाहट आई है तो भारत और अमेरिका के रिश्ते में गर्मजोशी आई है। दूसरी तरफ भारत के पारंपरिक साथी रहे रूस की दिलचस्पी पाकिस्तान में बढ़ी है। इससे साफ संकेत मिलते हैं कि अगर भारत नए विकल्पों की तरफ रुख कर सकता है, तो रूस भी ऐसा कर सकता है। भारत क्षेत्रीय-अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपने लिए नई संभावनाएं खोज रहा है और इसमें अमेरिका की मदद ले रहा है। दरअसल, आज के वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका और रूस दो धुरी बन गए हैं, जैसा शीत युद्ध के दौरान था। हाल ही में पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने रूस के सरकारी मीडिया से पाक सेना के लिए हथियार खरीदने की जिस योजना का खुलासा किया है, वह बताने के लिए पर्याप्त है कि पाक-रूस के गहरे होते संबंधों में कितनी साझा समझ है। किसी जमाने में रूस और भारत की दोस्ती और ऐतिहासिक अविश्वास के कारण पाकिस्तान से रूस के संबंधों के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा जाता था लेकिन अब यह दक्षिण एशिया में भू-राजनीतिक क्षेत्र में बदलाव की नई बयार है, जिसे हमारी केंद्र सरकार भांप नहीं पा रही है। रूस-पाक रिश्तों के आने वाले समय में और अधिक फलने-फूलने की संभावना है। पाकिस्तान और रूस एक दूसरे के स्वाभाविक साझेदार हो सकते हैं क्योंकि दोनों मुल्कों में अमेरिका विरोधी भावना जबरदस्त थी और दोनों को करीब लाने में इसी भावना की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। पाक-रूस के नीति-नियंताओं को लगता है कि दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए अमेरिकी प्रभाव को कम करने की जरूरत है। इसी तर्क पर दोनों देशों के संबंधों में गति आई है और सैन्य सहयोग भी हुआ है। सितंबर 2016 में रूस-पाक के बीच पहली बार संयुक्त सैन्य युद्धाभ्यास हुआ। रूस-पाकिस्तान दोस्ती को लेकर भारत को सतर्क रहना ही होगा।
’सत्यप्रकाश आर्य, हमीरपुर, उत्तर प्रदेश

पतन का रास्ता
बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने 26 नवंबर 1949 को एक बहुत सारगर्भित भाषण दिया था। इसमें उन्होंने बहुत-सी बातें कही थीं जिनमें एक बात खास थी, ‘‘धर्म में भक्ति निर्वाण की ओर ले जाती है परंतु राजनीति में भक्ति या ‘हीरो वर्शिप’ (किसी को पूजनीय बनाना) निश्चय ही पतन का रास्ता है। इससे अधिनायकवाद शुरू होता है।’’ आज के संदर्भ में सभी को बाबा साहब आंबेडकर का यह भाषण पढ़ना चाहिए विशेषकर सत्ता पक्ष के नेताओं को।
’लक्ष्मी नारायण मित्तल, मुरैना, मध्यप्रदेश

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