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चौपाल : न्यूनतम सरकार

‘स्वच्छ भारत’ अभियान चल रहा है, क्या ‘मजबूत भारत’ अभियान नहीं चलना चाहिए था? वह मजबूत भारत जिसमें देश भर की सरकारी इमारतों-निर्माणों को मजबूत बनाने की बात होती और इनके नहीं गिरने की गारंटी दी जाती।

Author May 18, 2018 3:56 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो सोर्स- पीटीआई)

दो दिन पहले कर्नाटक के रण में जब भाजपा का विजय-रथ धूल उड़ाते हुए आगे बढ़ रहा था, ठीक उसी समय प्रधानमंत्री के चुनाव क्षेत्र में एक निर्माणाधीन पुल टूट कर गिर पड़ा और उसके नीचे दर्जनों जानें चली गर्इं। जाहिर-सी बात है कि निर्माण में उचित मानकों का ध्यान नहीं रखा गया होगा और जम कर भ्रष्टाचार भी हुआ होगा। सबसे दुखद है कि यह सब करते हुए अधिकारियों को इस बात का कहीं से कोई डर नहीं लगा कि यहां के सांसद खुद प्रधानमंत्री हैं। आज ‘मिनिमम गवर्मेंट’ अर्थात न्यूनतम सरकार का नारा नकारात्मक अर्थ लेकर आभासित हो रहा है। इससे अब व्यंजित होता है कि आप कुछ भी कर लो, सरकार आपको छुएगी नहीं क्योंकि सरकार अब बहुत घट कर रह गई है; वह ‘सब चलता है’ की नीति पर चलने लगी है! भ्रष्ट अफसरों की इसी निर्भयता का परिणाम है वाराणसी हादसा। इस दौर में लगातार छोटी होती जा रही सरकारों के नीचे कभी विश्वविद्यालयों में मनमाने तरीके से सीटें खत्म कर दी जाती हैं, कभी प्रवेश परीक्षाओं में घोटाले हो जाते हैं। सरकार इन्हें नाप भी नहीं पाती क्योंकि उसका मीटर खुद ही छोटा हो गया है।

आम जनता के जीवन-जीविका और सुरक्षा से जुड़ी इन लापरवाहियों पर सरकार और उसके नुमाइंदों को जरा भी बुरा नहीं लगता। ऐसा लगता है जैसे ‘मिनिमम’ होते-होते सरकार खत्म ही हो गई है, जिसका कोई डर उसकी मशीनरी में नहीं है। केंद्र की मौजूदा राजग सरकार से नए तरीके से काम करने की उम्मीद थी, पर अब तक जैसे वही पुरानी लाइन चल रही है। रंग बदल गया है पर दिखावे और तुष्टीकरण से ऊपर सरकार जाती नहीं है। ‘स्वच्छ भारत’ अभियान चल रहा है, क्या ‘मजबूत भारत’ अभियान नहीं चलना चाहिए था? वह मजबूत भारत जिसमें देश भर की सरकारी इमारतों-निर्माणों को मजबूत बनाने की बात होती और इनके नहीं गिरने की गारंटी दी जाती।

वाराणसी हादसा न तो नया है और न ही समय के साथ यह पुराना पड़ेगा। देश भर में लाखों सरकारी स्कूल, पुल-पुलियाएं और ब्लॉक आदि के कार्यालय जर्जर स्थिति में हैं। उनकी सुध कौन लेगा? शायद कोई नहीं। समय के साथ वे गिरेंगे और लोग मरेंगे तो ऐसा शोर भी नहीं मचेगा जैसा आज मचा है। क्योंकि ऐसी सभी जगहें प्रधानमंत्री के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र में नहीं आएंगी कि लिख-बोल कर कुछ दिनों तक ‘एंटी इंकमबेंशी’ यानी सत्ता विरोधी लहर फैलाई जाए।
’अंकित दूबे, जेएनयू, नई दिल्ली

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