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चौपाल : इतिहास से सबक

जनमत को अपनी तरफ करने के लिए हमारे राजनेता हर वह पैंतरा अपनाते हैं, जिसका जनहित और विकास से दूर-दूर का नाता न हो। धर्म के रूपकों में यह और अधिक आसान हो जाता है।

हाल ही में गोवा, दमन और दिल्ली के आर्कबिशप ने देश के संविधान पर खतरा बताते हुए और एक जैसी संस्कृति के हावी होने के आरोप के आधार पर पत्रों के माध्यम से आगामी आम चुनाव में वर्तमान सरकार के विरोध में वोट देने की बात कही तो यह बहस का लाजिमी था कि भारतीय राजनीति में धर्म का कितना महत्त्व है। देखा जाए तो अनेक साधु-बाबा सालों से दक्षिणपंथी भाजपा को समर्थन देने की खुलेआम घोषणा करते आए हैं। इसी तरह कुछ मौलाना की ओर से भाजपा के विरोध में वोट देने के फतवे देने की भी खबरें आर्इं। गाय, गोमांस, तलाक, इफ्तार, हिंदुत्व और जेहाद जैसे मुद्दे गरमाने के साथ-साथ धार्मिक आधार पर राजनीतिक गुटबाजी भी चुनावों में देखने को मिलती है। मध्यप्रदेश सरकार में कम्प्यूटर बाबा को राज्यमंत्री बनाए जाने की घटना भी हाल ही है।

जनमत को अपनी तरफ करने के लिए हमारे राजनेता हर वह पैंतरा अपनाते हैं, जिसका जनहित और विकास से दूर-दूर का नाता न हो। धर्म के रूपकों में यह और अधिक आसान हो जाता है। फिर चाहे चुनावी राज्यों में धर्मस्थलों का दौरा हो या ताबड़तोड़ सांप्रदायिक बयानबाजी। भारतीय राजनीति में धर्म के प्रभुत्व की बात की जाए तो समझना होगा कि यह सब महज मंदिर या मस्जिद के विवाद से शुरू नहीं होता। धर्म को राज्य का मूल मानने वाले चाणक्य से लेकर औपनिवेशिक काल में भारत का शासन संभालने वाले अंग्रेजी साम्राज्यवादी तक धर्म यहां की राजनीति में दखलंदाजी करता नजर आता है।

सर्वविदित है कि कनिष्क, बलबन जैसे शासकों और विजयनगर जैसे साम्राज्यों ने खुद को दैवीय शक्ति का प्रतिनिधि घोषित कर शासन किया है। मुगल सम्राट अकबर ने तो ‘दीन-ए-इलाही’ तक की स्थापना कर दी थी। लेकिन वर्तमान परिस्थितियां राजशाही से दूर एक विविधता से परिपूर्ण धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लोकतांत्रिक मूल्यों पर टिकी है। ऐसे में धर्म का व्यक्तिगत बने रह कर जनतंत्र पर हावी न होने देने की सतर्कता बरतनी होगी, क्योंकि धार्मिक आधार पर विशाल भारत का दर्दनाक विभाजन भी हमारा इतिहास रहा है।
’कृष्ण जांगिड़, जयपुर