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चौपाल : भेदभाव की परतें

किसी भी फिल्म के सफल होने में नायिका और नायक दोनों की बराबर भूमिका होती है। सिर्फ पुरुषों के दम पर ही फिल्म नहीं चल सकती। फिर दोनों के पारिश्रमिक में फर्क क्यों?

Author June 15, 2018 4:10 AM
दीपिका पादुकोण ने फिल्म में भूमिका के लिए पुरुष अभिनेताओं की तरह फीस की मांग की।

हाल ही में एक खबर ने मेरा ध्यान खींचा, जिसके मुताबिक दीपिका पादुकोण ने फिल्म में भूमिका के लिए पुरुष अभिनेताओं की तरह फीस की मांग की। यों तो महिला के श्रम को कहीं गिना ही नहीं जाता है और गिना भी जाता है तो पुरुषों से कम, लेकिन सिनेमा के क्षेत्र में भी यह होता है, यह जान कर हैरानी हुई। जबकि किसी भी फिल्म के सफल होने में नायिका और नायक दोनों की बराबर भूमिका होती है। सिर्फ पुरुषों के दम पर ही फिल्म नहीं चल सकती। फिर दोनों के पारिश्रमिक में फर्क क्यों? यह मुश्किल हमारे घर, परिवार, गांव, कस्बाई इलाके और महानगरों तक देखने को मिलती है। इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है, क्योंकि जेंडर के मनोविज्ञान की परतें हमारे समाज में बहुत गहरे तक जमी हुई हैं। इस कारण किसी को इसमें कुछ गलत नजर नहीं आता। कई बार इस तरह की बात निकलने पर लोगों की ओर से पहला विचार आता है कि आजकल तो जेंडर असमानता शहरों में कम या खत्म हो गई है। कहा जाता है कि गांवों में आज भी यह गैरबराबरी है, क्योंकि वहां के लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं। इतना बोल कर हम शहरी लोग इस बात से पल्ला झाड़ लेते हैं। मगर गहराई से सोचें तो यह मसला हमारी परवरिश और सामाजिक ताने-बाने की परतें खोलती हैं। यह भारतीय पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं की स्थिति के एक और रूप को बयान करती है।
’प्रेरणा मालवीया, भोपाल

आभासी का दुश्चक्र
आज के दौर में सोशल मीडिया युवाओं के जीवन का अभिन्न अंग बन गया है। युवा चाहे व्यक्तिगत कामों से या फिर किसी औपचारिक काम से सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन इसके अधिक प्रयोग से वह सोशल मीडिया के आदी होते जा रहे हैं। हम कह सकते हैं कि किसी भी चीज की अति हानिकारक है। फेसबुक को हथियार बना कर होने वाली अपराधिक घटनाओं की खबरें आती रहती हैं। लेकिन यही फेसबुक आज सोशल मीडिया का एक अहम हिस्सा है। दिन के चौबीस घंटे में से लगभग छह या सात घंटे युवा सोशल मीडिया पर गुजार देते हैं, जिसका सीधा असर युवाओं की सामान्य कार्यप्रणाली पर पड़ता है।

सोशल मीडिया से दूरी बना कर आज के कुछ युवाओं ने यूपीएससी परीक्षा में शीर्ष स्थान हासिल किया है। इससे पता चलता है कि थोड़ी दूरी बना कर कितनी बड़ी कामयाबी हासिल की जा सकती है और जीवन में सफल हुआ जा सकता है। आज के युवाओं का पारिवारिक रिश्ता सोशल मीडिया के जरिए टूटता जा रहा है। बच्चे घर में ज्यादा समय बिताने के लिए सोशल मीडिया का विकल्प चुनते हैं। जाहिर है, युवा पीढ़ी को सही राह दिखाने की जरूरत है।
’सुनाक्षी, भीमराव आंबेडकर कॉलेज, दिल्ली

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