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चौपाल : अधूरी जीत

देश के विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा का वर्चस्व जिस तरह से बढ़ता जा रहा है वह संकेत कर रहा है कि 2019 के आम चुनाव में भी इसका सकारात्मक असर पड़ सकता है।

Author May 18, 2018 4:00 AM
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की फाइल फोटो। (फोटो सोर्स- पीटीआई फोटो)

कर्नाटक के चुनाव नतीजों ने फिर साबित कर दिया कि कांग्रेस आलाकमान अपनी कमियों को सुधारने में नाकाम रहा है। कांग्रेस को विभिन्न राज्यों में मिल रही हार का मंथन कर लेना चाहिए और प्रधानमंत्री पद के लिए ऐसा चेहरा तलाशना चाहिए जो कुशल राजनीतिक और सरकार चलाने के काबिल हो और जिस पर देश भी भरोसा करे। कांग्रेस की गिरती साख लोकतंत्र के लिए भी खतरे की घंटी है, क्योंकि देश में एक ही पार्टी का बढ़ता वर्चस्व तानाशाही को जन्म दे सकता है। देश के विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा का वर्चस्व जिस तरह से बढ़ता जा रहा है वह संकेत कर रहा है कि 2019 के आम चुनाव में भी इसका सकारात्मक असर पड़ सकता है। अगर कर्नाटक विधानसभा चुनाव का विश्लेषण किया जाए तो वहां बेशक भाजपा को शानदार जीत मिली, लेकिन यह जीत अधूरी मानी जाएगी क्योंकि असली और पूरी जीत तब मानी जाती जब उसे पूर्ण बहुमत मिलता।
’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

दोहरी मानसिकता
ज्योति सिडाना का लेख ‘समानता की तलाश में एकल महिला’ (17 मई) पढ़ा। यह विडंबना ही है कि एकल महिलाएं हमेशा हमारे पितृसत्तात्मक समाज में कठघरे में ही रहती हैं। उस पर भी यदि महिला सुंदर हो, पढ़ी-लिखी हो, अच्छा वेतन पाती हो तो वह पुरुषों को बहुत खटकती है। यहां मैं एक बात और कहना चाहूंगी और हो सकता है मेरी इस सोच को दकियानूसी माना दाए मगर मगर कुछ महिलाएं भी इसी तरह का व्यवहार करती हैं। एक महिला और एकल होने के नाते मैं इस बात को बहुत अच्छे से समझ सकती हूं। दरअसल, हमारे समाज ने महिलाओं को हमेशा किसी न किसी पर आश्रित देखा है या देखना चाहता है। यदि वह अपने निर्णय खुद लेती है, जिंदगी को अपने हिसाब से जीती है और सबसे बड़ी बात, वह खुश रहती है तो इससे लोगों को बहुत मुश्किल होती है। और यह मुश्किल हमारे समाज में महिला के प्रति गहरे बैठी दोहरी मानसिकता की बहुत-सी परतें खोलती है।
’प्रेरणा मालवीय, भोपाल

गांधीजी के साथ
ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार ने 5 मई 18 को एक विज्ञापन ‘आजीविका एवं कौशल विकास मेला’ के संदर्भ में जारी किया है। इस विज्ञापन में एक ओर गांधीजी की फोटो है और दूसरी ओर मोदीजी की। गांधीजी मशीनों के सख्त विरोधी थे। ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योगों के संबंध में उनकी अपनी धारणा थी। वे कहते थे कि हर गांव अपनी जरूरत के लिए स्वयं उत्पादन करे और जिस वस्तु का उत्पादन नहीं कर सके उसे अपने सबसे निकटस्थ गांव से ले ले। वे ‘हिंद स्वराज’ में पूछते हैं कि ‘जब ये सब चीजें यंत्र से नहीं बनती थीं तब हिंदुस्तान क्या करता था! यंत्र का गुण तो मुझे एक भी याद नहीं आता जबकि उसके अवगुणों पर मैं पूरी किताब लिख सकता हूं।’ पूंजी और श्रम को वे एक-दूसरे का पूरक मानते थे परंतु सद्भाव में। गांधीजी कभी भी ब्रिटिश सरकार के और बाद में ‘ट्रांसफर ऑफ पॉवर’ के बाद भारत सरकार के नौकर नहीं रहे। इसलिए सरकारी विज्ञापन में उनकी फोटो देना न्यायसंगत नहीं है। फिर मोदीजी के साथ उनकी फोटो देने का क्या तात्पर्य हो सकता है? गांधीजी के सिद्धांत और मोदीजी के सिद्धांतों में जमीन-आसमान का अंतर है। मोदीजी जिस तरह की पश्चिमीकृत आधुनिकता भारत में लाना चाहते हैं, गांधीजी ने हमेशा उसकी आलोचना की है। लिहाजा, भारत सरकार को अपने विज्ञापनों में गांधीजी के चित्र का उपयोग नहीं करना चाहिए।
लक्ष्मी नारायण मित्तल, मुरैना, मध्यप्रदेश

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