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चौपाल: महंगाई का र्इंधन

निजी कंपनियों द्वारा की जा मनमानी पर सरकार को लगाम लगाते हुए तथा आम जनता को राहत देने के लिए तुरंत नीतियों में बदलाव करते हुए उचित कदम उठाने होंगे, जिससे जनता आसमान छूती महंगाई की मार से बच सके।

Author April 23, 2018 3:47 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है।

देश भर में पेट्रोल की कीमतें पिछले पचपन महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं। जिससे देश की आम जनता बेहाल है। पेट्रोल-डीजल के दामों में बेतहाशा वृद्धि से सबसे ज्यादा किसान तथा अन्य आम लोग प्रभावित हुए हैं। पेट्रोल पदार्थों में बढ़ती महंगाई की वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमत बताई जा रही है। जबकि सच्चाई यह है कि वर्तमान में कच्चे तेल की कीमत 74 डॉलर प्रति बैरल है, जो अब भी चार साल पहले की कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल से कम है। तो फिर मई 2014 की तुलना में पेट्रोल-डीजल इतना महंगा क्यों? इसका मूल कारण सरकार द्वारा लगाया गया पेट्रोल-डीजल पर त्रिस्तरीय टैक्स है। 2014 से कच्चे तेल की कम कीमतों के सभी लाभ तेल कंपनियों द्वारा अर्जित किए गए, जिसका अप्रत्यक्ष रूप से सरकार को फायदा हुआ, जो वास्तविक रूप से जनता को होना चाहिए था। पेट्रोल-डीजल की कीमतों को नियंत्रण-मुक्त किया गया यानी उन्हें बाजार के रुख के हिसाब से तय करने का फार्मूला स्वीकार किया गया, तो उसके पीछे यही तर्क था कि इससे उपभोक्ताओं को फायदा होगा।

जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत गिरेगी, तो पेट्रोल-डीजल के खुदरा दाम भी कम होंगे, और इससे ग्राहक लाभान्वित होंगे। लेकिन हम जानते हैं कि हाल के कुछ महीनों को छोड़ दें, तो पिछले तीन-साढ़े तीन साल तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम में नरमी का रुख रहा। लेकिन इसका फायदा उपभोक्ताओं को नहीं मिल पाया, क्योंकि टैक्स बढ़ा दिए गए। अब जब पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें बढ़ गई हैं, तो टैक्स घटा कर ग्राहकों को राहत देने की पहल क्यों नहीं की जा रही है? इसी तरह चलता रहा तो पेट्रोल की कीमत सौ रुपए प्रति लीटर के पार भी जा सकती है। क्या यही अच्छे दिन हैं?

निजी कंपनियों द्वारा की जा मनमानी पर सरकार को लगाम लगाते हुए तथा आम जनता को राहत देने के लिए तुरंत नीतियों में बदलाव करते हुए उचित कदम उठाने होंगे, जिससे जनता आसमान छूती महंगाई की मार से बच सके। साथ ही राजनीतिक पार्टियों को आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए हिंदू-मुसलिम, मंदिर-मस्जिद की राजनीति को छोड़ ऊर्जा, पानी, शिक्षा जैसे मूल मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों के सिलसिले में एक और मुद्दे की चर्चा जरूरी है। भारत को अपनी जरूरत या खपत का करीब अस्सी फीसद तेल आयात करना पड़ता है। इससे जहां आयात खर्च बढ़ता है और इसके फलस्वरूप देश व्यापार घाटा बढ़ता है, वहीं महंगाई में बढ़ोतरी का एक प्रबल कारण मौजूद हो जाता है, क्योंकि परिवहन और ढुलाई की लागत बढ़ जाती है। इन अनुभवों को देखते हुए यह जरूरी है कि हमारा देश पेट्रोलियम पर अपनी निर्भरता घटाए और ऊर्जा के अन्य संसाधनों पर अधिक ध्यान दे।
हरेंद्र सिंह कीलका, सीकर

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