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यूपी: निकाय चुनाव के बाद भी पूरा नहीं हुआ रोजगारमुखी प्रदेश बनाने का दावा

सरकार को सत्ता में आए एक साल से ऊपर हो गया मगर अभी तक रोजगार की संभावना नहीं दिखती है। जबकि सरकार का दावा है कि उत्तर प्रदेश में रोजगार सृजन को प्राथमिकता देनी है।

Author May 7, 2018 3:37 AM
यूपी के सीएम योगी आदित्य नाथ की फाइल फोटो। (Photo- Agency)

चौपाल: बेरोजगारी का दंश

उत्तर प्रदेश में रोजगार की समस्या व्यापक होती जा रही है। बेरोजगारी का दंश झेल रहे युवा आज गांव छोड़ कर शहरों में कल-कारखानों या कंपनियों में काम करने पर मजबूर हैं क्योंकि पढ़ाई करने के बाद हर युवा यही सोचता है कि अब अपने पैरों पर खड़े होकर माता-पिता को साथ लेकर रोजी-रोटी चलानी है। लेकिन सामने जो हालात हैं, उनमें रोजगार आज केवल समाचार पत्रों की सुर्खियों में दिखता है। हकीकत तो यह है कि सरकार सत्ता में आती है तो भारी तादाद में रोजगार देने का भरोसा देती है लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता है। सत्ता में आने के बाद सब खत्म हो जाता है। हाल ही में उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने समाचारपत्रों में व्यापक रूप में रोजगार की विज्ञप्तियां जारी कराई थीं। सरकार का कहना है कि तीन साल में बीस लाख रोजगार युवाओं को मिलेगा। लेकिन यह बात कहां तक सही है? सरकार को सत्ता में आए एक साल से ऊपर हो गया मगर अभी तक रोजगार की संभावना नहीं दिखती है। जबकि सरकार का दावा है कि उत्तर प्रदेश में रोजगार सृजन को प्राथमिकता देनी है। सरकार ने इसी साल चार लाख भर्तियां करने का दावा किया और कहा कि उत्तर प्रदेश रोजगारमुखी प्रदेश बनेगा। लेकिन इसका अभी कोई पता नहीं है। निकाय चुनाव भी बीत गए, लेकिन अभी तक कई महकमों में भर्ती की सुगबुगाहट नहीं दिख रही है। राज्य में रोजगार की केवल बात होती है, हकीकत इसके उलट है। यह बहुत बड़ा मसला है, क्योंकि उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा राज्य है और यहां ऐसा हाल होगा तो समझा जा सकता है कि भविष्य की कैसी तस्वीर होगी। सरकार को हर हाल में रोजगार के इंतजाम करने होंगे, नियमित बहालियां करनी होंगी वरना बेरोजगारी के दंश झेल रहे युवा और बुरी हालत में चले जाएंगे।
’राहुल उपाध्याय, बलिया, उत्तर प्रदेश

जवाब की दरकार
भाजपा के सांसद विश्वविद्यालयों के मामलों में खूब रुचि ले रहे हैं। इसकी ताजा बानगी है अलीगढ़ से भाजपा सांसद सतीश गौतम का एएमयू प्रशासन को पत्र लिखना। इस पत्र में उन्होंने वहां लगी मोहम्मद अली जिन्नाह की तस्वीर पर आपत्ति दर्ज की और फिर इसके बाद एक राष्ट्रव्यापी बहस छिड़ गई। इससे पहले 2016 के फरवरी महीने में जेएनयू में कथित तौर पर राष्ट्रविरोधी नारे लगने के कई दिन बाद तक जब कोई कानूनी कार्रवाई शुरू नहीं हुई थी तब पूर्वी दिल्ली के भाजपा सांसद महेश गिरि ने सबसे पहले इसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। उसके बाद क्या हुआ यह कहने की जरूरत नहीं है। अब जेएनयू पिछले दो साल की व्यवस्थागत नीतियों के कारण चरणबद्ध तरीके से खाली हो रहा है। दो साल से यहां किसी को भी शोध में दाखिला नहीं दिया जा रहा है। दो साल से प्रवेश परीक्षा में चुने हुए उम्मीदवारों की सूची सार्वजनिक नहीं की जा रही है। ऐसे में उम्मीद है कि अपने साथियों की राह पर चलते हुए दक्षिणी दिल्ली के सांसद, जिनके निर्वाचन क्षेत्र का हिस्सा है जेएनयू, माननीय रमेश बिधूड़ी जेएनयू प्रशासन को पत्र लिख कर जवाब तलब करेंगे और छात्रों की हकमारी से जुड़े एक बड़े मुद्दे पर एक राष्ट्रव्यापी बहस हो सकेगी।
’अंकित दूबे, जेएनयू, नई दिल्ली

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