ताज़ा खबर
 

चौपाल: स्त्री के विरुद्ध

बलात्कार एक जघन्य अपराध है और जिसकी कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। कठुआ और उन्नाव की घटनाओं का सबसे दुखद पहलू यह है कि दोनों को राजनीतिक रूप दे दिया गया।
Author April 19, 2018 16:14 pm

जम्मू कश्मीर के कठुआ और उत्तर प्रदेश के उन्नाव में हुई बलात्कार की घटनाएं सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हम ऐसे समाज में रह रहे हैं जहां महिला को केवल उपभोग की वस्तु समझा जाता है! इन घटनाओं से संवेदनशील लोगों में पीड़ा है और आक्रोश भी। पीड़ा इस बात की कि इक्कीसवीं सदी में भी हम ऐसे समाज में रह रहे हैं जहां जब मर्जी बलात्कार किया जा सकता है और आक्रोश इस बात का कि तुरंत एक ऐसी भीड़ एकत्रित हो जाती है जो इस निंदनीय कृत्य को धर्म, जाति और राजनीति से जोड़ कर बलात्कार के दोषी को बचाने की कोशिश करने लगती है। बलात्कार एक जघन्य अपराध है और जिसकी कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। कठुआ और उन्नाव की घटनाओं का सबसे दुखद पहलू यह है कि दोनों को राजनीतिक रूप दे दिया गया। जहां दोषियों को तुरंत गिरफ्तार करके कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए थी वहां उनके बचाव में तिरंगा लपेटे अचानक एक ऐसी भीड़ आ जाती है जो अपराध को राजनीतिक रंग देने का प्रयास करने लगती है।

नेताओं के संवेदनहीन बयान भी महिलाओं के प्रति उनकी मानसिकता को उजागर करते हैं। पुलिस-प्रशासन दबंगों का बचाव करने में लग जाते हैं। इस माहौल में जनता में हताशा क्यों न हो? क्या इसी सुशासन और व्यवस्था की आशा से जनता ने अपना भविष्य इन रहनुमाओं को सौंपा था? यही रहनुमा कानून और महिला सम्मान की धज्जियां उड़ाने में लगे हैं। इन्हें सिर्फ सत्ता और स्वार्थ की चिंता है न कि जनता की सुरक्षा और कानून व्यवस्था की। ऐसा नहीं है कि महिलाओं के खिलाफ हो रहे यौन शोषण में सिर्फ अल्पशिक्षित लोग अपराधी हैं। हाल ही में जवाहरलाल नेहरू और दिल्ली विश्वविद्यालय में हुई घटनाओं ने सबको हैरत में डाल दिया था और न्याय की मांग के लिए छात्रों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ा था। दक्षिण दिल्ली के एक प्रसिद्ध सरकारी अस्पताल के डॉक्टर और तीन कर्मचारियों द्वारा इक्कीस साल की प्रयोगशाला प्रशिक्षु के साथ अस्पताल में नौकरी दिलाने के नाम पर एक महीने से अधिक समय तक बलात्कार किए जाने की घटना भी सुर्खियों में रही थी।

गुरुग्राम के सिविल अस्पताल के शल्य चिकित्सक को एक मरीज के साथ कथित तौर पर बलात्कार करने के मामले में गिरफ्तार किया गया था। कार्यक्षेत्र में हुई इन अमानुषिक घटनाओं का भी वही हाल होता है जो कठुआ और उन्नाव की घटनाओं का हुआ। अंतर केवल इतना है कि यहां धर्म और राजनीति की जगह आरोपित पुरुष को बचाने के लिए तथाकथित पढ़े-लिखे सहकर्मी व्यवस्था पर दबाव बनाने लगते हैं। पीड़ित को डराने और शिकायत वापस लेने के प्रयास किए जाते हैं। इसकी जड़ में महिलाओं को दोयम दर्जे की नागरिक समझने की मानसिकता है जिन्हें कभी भी डराया या बदनाम किया जा सकता है।
अफसोसनाक है कि हमारे देश में सख्त कानून तो है अगर कुछ नहीं है तो बस महिलाओं को बराबर समझने की मानसिकता, अपराधियों को सजा दिलवाने का साहस, कमजोर तक न्याय पहुंचाने का संकल्प और घटिया मानसिकता पर लगाम लगाने की प्राथमिकता। सरकार, कानून, संस्थाएं, समाज और हम सिर्फ इंतजार करते हैं एक और भयावह घटना के होने का, एक और महिला की इज्जत लुटने का।
’अश्वनी राघव ‘रामेंदु’, उत्तमनगर, नई दिल्ली

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App