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समाज में फैली बेरोजगारी के लिए क्या आरक्षण जिम्मेदार है?

हकीकत यह है कि आवश्यक कर्मचारियों की कमी से देश को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। उदाहरण के लिए देश को सड़क दुर्घटनाओं के कारण हर साल सकल घरेलू उत्पाद के तीन प्रतिशत के बराबर आर्थिक हानि उठानी पड़ती है।

Author May 8, 2018 04:44 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

चौपाल: बेरोजगारी पर परदा

आरक्षण जारी रहने या खत्म हो जाने की बात भले ही सार्वजनिक मंचों पर बहस का मुद्दा न हो, लेकिन सोशल मीडिया पर इस पर अंतहीन बहस चलती रहती है। अक्सर ऐसी बात फैलाई जाती है जिससे संदेश जाता है कि सवर्ण वर्ग के युवा सिर्फ आरक्षण की वजह से बेरोजगार हैं और इसीलिए उन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिल पाती। जबकि आरक्षण का समर्थन करने वाला वर्ग तर्क देता है कि आरक्षण के दायरे में आने वाले वर्ग की हालत आज भी दयनीय है और इसके लिए वह उत्पीड़न और भेदभाव जिम्मेदार है जो सदियों से जाति के नाम पर उनके साथ हुआ है। सवाल यह है कि समाज में फैली बेरोजगारी के लिए क्या आरक्षण जिम्मेदार है? कहीं ऐसा तो नहीं कि निहित स्वार्थी तत्त्व सोशल मीडिया पर बेरोजगारी के लिए आरक्षण को जिम्मेदार ठहरा कर समाज को बांटना चाहते हैं? अगर गहराई से देखा जाए तो चारों ओर फैली बेरोजगारी के लिए आरक्षण जिम्मेदार नहीं है। कुछ समय पहले आई खबरों पर गौर करें तो पता चलता है कि राज्य और केंद्र सरकार के अनेक विभागों में लाखों पद खाली हैं। राज्य सरकार के सिविल विभागों में तो हालात कहीं ज्यादा बदतर हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार राज्य और केंद्र सरकार दोनों मिल कर करीब पंद्रह-बीस लाख शिक्षित बेरोजगार युवाओं को सरकारी नौकरी दे सकते हैं। इन पदों के खाली पड़े रहने के पीछे अक्सर तर्क यह होता है कि सरकारों के पास बजट ही नहीं है तो वे भर्तियां कहां से करें।

हकीकत यह है कि आवश्यक कर्मचारियों की कमी से देश को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। उदाहरण के लिए देश को सड़क दुर्घटनाओं के कारण हर साल सकल घरेलू उत्पाद के तीन प्रतिशत के बराबर आर्थिक हानि उठानी पड़ती है। जबकि ट्रैफिक पुलिसकर्मियों की कमी को दूर करके सड़क हादसों में पर काबू पाया जा सकता है। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और नर्सों की भारी कमी से देश की गरीब आबादी को स्वास्थ्य पर कहीं ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है। इसी तरह, गरीबी उन्मूलन के नाम पर चलने वाली योजनाएं भी कर्मचारियों की कमी की वजह से बेमानी बनी हुई हैं।

दरअसल, कुछ लोगों की कोशिश यह है कि युवाओं के बीच यह संदेश फैला दिया जाए कि मूल समस्या बेरोजगारी या पदों का खाली रहना नहीं, बल्कि आरक्षण है। क्या निहित स्वार्थी तत्त्व यह चाहते हैं कि युवा नौकरी की मांग न करें, बल्कि या तो आरक्षण की मांग करें या आरक्षण खत्म करने की मांग करें? आज हकीकत यह है कि कुछ सौ खाली पदों के लिए अगर विज्ञापन निकलता है तो कई लाख उच्च शिक्षित पढ़े-लिखे युवा इन पदों के लिए आवेदन भेजते हैं। जाहिर है, बेरोजगारी की समस्या बेहद गंभीर है। आज अगर देश में निजी क्षेत्र लोगों को अच्छी संख्या में रोजगार दे और सरकारें खाली पदों को भरने और नई नौकरियां सृजित करने को प्राथमिकता दें तो काफी हद तक बेरोजगारी की समस्या का हल हो जाएगा। फिर आरक्षण भी बहस का विषय नहीं बनेगा।
’हरजीत सिंह, ऊधमसिंह नगर, उत्तराखंड

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