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कैदियों के लिए एक जैसे कायदे-कानून, फिर कैसे हो गई लालू यादव और राहुल गांधी की मुलाकात?

लालू इलाज के लिए दिल्ली के एम्स में भर्ती हुए थे या राजनीति करने के लिए? इसकी जांच होनी चाहिए कि अस्पताल में उनसे कौन-कौन मिला और किसने अनुमति दी?

Author May 2, 2018 4:32 AM
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 30 अप्रैल को सुबह-सुबह एम्स जाकर राजद अध्यक्ष लालू यादव से मुलाकात की और उनका हालचाल जाना था। (फोटो-ट्विटर)

चौपाल: लालू का इलाज

कैदियों से जेल में मिलने के नियम हैं और उन्हीं के अनुसार किसी को अनुमति दी जाती है। लेकिन जब कोई कैदी बीमारी के कारण अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती होता है तब क्या मिलने का कोई कायदा-कानून नहीं होता? या पहुंच वाले लोगों के लिए ही सब तरह की छूट है? आखिर किस आधार पर लालू और राहुल आधा घंटे मिले? लालू इलाज के लिए दिल्ली के एम्स में भर्ती हुए थे या राजनीति करने के लिए? इसकी जांच होनी चाहिए कि अस्पताल में उनसे कौन-कौन मिला और किसने अनुमति दी? कानून का मखौल न बनाओ! लालू को रांची मेडिकल कॉलेज में इसीलिए इलाज का अभाव नजर आ रहा है कि वहां से राजनीति कैसे होगी? लालू को अपराधी तो घोषित कर दिया लेकिन घोटाले की रकम की वसूली का क्या हुआ?
’यश वीर आर्य, देहरादून

दुरुस्त आयद
चीन के वुहान प्रांत में भारतीय प्रधानमंत्री और चीनी राष्ट्रपति की मुलाकात और बातचीत से साफ है कि दोनों ही देश डोकलाम जैसे विवादों को भूल कर एक बेहतर भविष्य बनाने के प्रयास में जुटे हैं। हाल ही में भारत से जुड़े कई मुद्दों पर चीन का बदला रुख भारत के लिए सुखद आश्चर्य से कम नहीं था। भारत हमेशा चीन से बेहतर संबंध बनाने का आग्रही रहा है। दोनों देशों के बीच 1962 के युद्ध से जो दरार पड़ गई थी उसे भरने का स्वर्णिम अवसर मोदी और जिनपिंग के पास है। इतिहास तो बदला नहीं जा सकता, लेकिन विश्व की लगभग चालीस फीसद आबादी की सुख-शांति और कल्याण के लिए मोदी और जिनपिंग ने जो ऐतिहासिक कदम तो उठाया है वह निश्चय ही स्वागतयोग्य है।
’विजय कोष्टी, सांगली, महाराष्ट्र

फायदे का अवसर
पिछले कुछ महीनों से चीन और अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध चल रहा है। अमेरिका ने चीन के तेरह सौ उत्पादों पर पच्चीस फीसद आयात शुल्क लगाने का निर्णय लिया तो चीन ने भी अमेरिका के एक सौ अट्ठाईस उत्पादों पर पच्चीस फीसद आयात शुल्क लगाने का फैसला किया है। वैश्विक व्यापार जगत दोनों देशों के इस नीतिगत बदलाव से चिंतित है मगर भारत देश के लिए यह एक फायदे का अवसर भी है। भारत अगर चीन में अपना निर्यात बढ़ाने में सफल होता है तो इससे हमारी बढ़ती अर्थव्यवस्था को थोड़ी और गति जरूर मिलेगी। यह एक अच्छा संकेत है कि हमारे प्रधानमंत्री चीन के वुहान शहर में अनौपचारिक शिखर वार्ता करने पहुंचे और दोनों देशों ने सीमा विवाद सहित टकराव के अन्य मुद्दों को दरकिनार कर मधुर संबंध बनाने पर जोर दिया है। यह जाहिर है कि चीन भारत को खुद के बाद एशिया का दूसरा उभरता हुआ सबसे बड़ा देश मानता है और बिना भारत के सहयोग से वह अपनी विस्तारवादी नीति में सफल नहीं हो पाएगा चाहे ‘वन बेल्ट वन रोड’ को पूरा करना हो या फिर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना। अब समय आ गया है कि भारत अपने शासन-प्रशासन को सुधारे और ‘स्किल इंडिया’ जैसी परियोजनाओं को बढ़ावा दे ताकि छोटे और मझोले व्यापारियों का सामान चीन के बाजारों को चुनौती देने लायक हो सके।
’पियूष कुमार, नई दिल्ली

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