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चौपाल: लोकतंत्र के लिए

कर्नाटक चुनाव के दौरान और उसके बाद बहस का केंद्र बन गया 2019 का भावी आम चुनाव। इस तरह की स्थितियों से ऐसा लगता है कि भारत में राजनीति मात्र चुनावी जोड़-तोड़ तक सिमट कर रह गई है। यह आदर्श स्थिति नहीं है। ऐसे चुनावों से देश की विकास प्रक्रिया में बाधा आती है।

Author June 8, 2018 4:55 AM
शिवसेना, कांग्रेस और बीजेपी के प्रतीक (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनेक कसौटियों में सबसे पहली कसौटी यही होती है कि चुनाव निष्पक्ष हो! पिछले दिनों उपचुनावों के लिए हुए मतदान के दौरान खासकर महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में काफी संख्या में ईवीएम यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें खराब पाई गर्इं। यह कैसा चुनाव प्रबंधन है? आयोग ने गरमी को खराबी की वजह बताई। अगर गरमी की वजह से हुई तो शुरू से ही, यानी सुबह के वक्त भी मशीनें सही से क्यों काम नहीं कर रही थी? फिर गरमी पर आरोप क्यों लगाया जाए? ऐसे मामलों से चुनाव की विश्वसनीयता पर आंच आती है। ऐसे में लोकतंत्र का क्या हाल होगा? कई बार गड़बड़ियां सामने आने के बावजूद ईवीएम का समर्थन और उससे वोटिंग का मतलब समझना मुश्किल है।

कर्नाटक चुनाव के दौरान और उसके बाद बहस का केंद्र बन गया 2019 का भावी आम चुनाव। इस तरह की स्थितियों से ऐसा लगता है कि भारत में राजनीति मात्र चुनावी जोड़-तोड़ तक सिमट कर रह गई है। यह आदर्श स्थिति नहीं है। ऐसे चुनावों से देश की विकास प्रक्रिया में बाधा आती है। अरसे से हम यही देख रहे हैं कि पूरे देश में कहीं न कहीं चुनाव चल रहे हैं और पक्ष से लेकर विपक्ष और मीडिया से लेकर आम जनता तक चुनावी चर्चा में ही व्यस्त रहते हैं।

क्या इतनी ज्यादा राजनीतिक उलझन देश की सेहत के लिए ठीक है? बंगाल और उत्तर प्रदेश तक का अनुभव यही बताता है कि चुनाव आयोग हिंसा और अव्यवस्था को रोकने में नाकाम रहा है। ऐसे में सवाल स्वाभाविक है कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ करवाने की कवायद का दम हम कैसे भर सकते हैं। इसलिए हिंसा और अव्यवस्था को रोकने के लिए अलग-अलग चुनाव ही हितकारी होगा। इन सभी मुद्दों को देखते हुए चुनाव आयोग को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए संवेदनशील होना होगा।
’जालाराम चौधरी, जोधपुर

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