jansatta column Choupal artical about Ideological pollution is extremely dangerous for society - चौपाल: वैचारिक प्रदूषण - Jansatta
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चौपाल: वैचारिक प्रदूषण

आज जबकि छह इंच के ‘स्क्रीन’ पर देश बस रहे हैं, समाज बन और बंट भी रहे हैं; विकास हो रहा है और बहस भी, ऐसे में यहां के प्रदूषण को नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा। यह है वैचारिक प्रदूषण, जो बेहद खतरनाक है।

Author May 11, 2018 4:35 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर। (फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस)

मानव-जीवन के विकास पथ पर चलते हुए आज तक हमने नित नई उपलब्धियां हासिल कीं लेकिन हमें इनकी भारी कीमत भी लगातार चुकानी पड़ी है। थल प्रदूषण के बाद हमने अपनी नदियों समेत तमाम प्राकृतिक जल स्रोतों को अपवित्र करके रख दिया और जल प्रदूषण तक पहुंचे। फिर हमने उद्योगों का और अधिक विकास किया, तब नंबर आया वायु प्रदूषण का। चींटी की तरह रेंगती गाड़ियों ने इतना धुआं उगला कि आसमान की नीलिमा काली होने को आई। विकास के असामान्य वितरण के फलस्वरूप ग्रामीण आबादी का शहरों में पलायन हुआ। जनसंख्या घनत्व बढ़ा और फिर हर ओर चिल्ल-पों मचने लगी। तब एक नए तरह का प्रदूषण ध्वनि प्रदूषण के रूप में सामने आया।

आज जबकि छह इंच के ‘स्क्रीन’ पर देश बस रहे हैं, समाज बन और बंट भी रहे हैं; विकास हो रहा है और बहस भी, ऐसे में यहां के प्रदूषण को नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा। यह है वैचारिक प्रदूषण, जो बेहद खतरनाक है। यह प्रदूषण कैसे फैलता है इसे समझना तो अधिक मुश्किल नहीं है पर इसकी रोकथाम और शमन बेहद मुश्किल है क्योंकि यह काम किसी भी प्रकार के कानून आदि बनाने से नहीं होगा। सूचनाओं की बाढ़ के इस दौर में हर कोई अपनी ओर से लगातार कुछ न कुछ उंड़ेलने की फिराक में रहता है। अपनी बात कहने की हड़बड़ी में हम भूल जाते हैं कि सामने वाले पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। अपनी ओर से खोखली और गैर-जरूरी टिप्पणियां बहुतायत में डालते हुए हमें भान नहीं होता कि हमसे जुड़े हुए लोग चाहे-अनचाहे इन्हें अपने दिमाग में जगह दे रहे हैं। अनावश्यक रूप से देवी-देवताओं की फोटो भेजना, अपनी हर एक तस्वीर को चस्पां कर देना। कोई लेने को तैयार नहीं है फिर भी गुड मॉर्निंग-गुड नाइट करना, बिना पूछे ‘टैग’ करना और कहीं से आई सूचना की जांच किए बगैर उसे आगे बढ़ा देना, यही वैचारिक प्रदूषण के कुछ उदाहरण हैं।

यह तभी खत्म होगा जब व्यक्ति का विवेक जागेगा कि क्या ‘पोस्ट’ करना ठीक है और क्या नहीं। …और आज के युग में जब हम ‘ट्रेंड’ की दौड़ में भेड़ों की तरह हांके जा रहे हैं, रुक कर विवेकपूर्ण होना कितना मुश्किल है! आज जरूरत है कि लोगों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया जाए और अपनी आभासी दुनिया को ज्यादा साफ-स्वच्छ और निवास के लिए कम से कम नुकसानदेह बनाने की पहल की जाए।
’अंकित दूबे, जेएनयू, नई दिल्ली

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