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चौपाल : सरकारी बनाम निजी

अक्सर लोग बीमार होते है और उनके परिजन अगर आर्थिक रूप से सक्षम हैं तो मरीज को निजी क्लीनिक या अस्पताल में ले जाया जाता है। लेकिन इसके बाद महंगे बिल को लेकर चिंता भी जाहिर की जाती है। दरअसल, लोगों के पास विकल्प नहीं है।

Thirty year old woman, birth, 5 infants, same time, gujarat newsप्रतीकात्मक तस्वीर।

‘सेहत के सामने’ (दुनिया मेरे आगे, 7 जून) लेख पढ़ते समय बीते कुछ दिनों के दौरान हुई इससे संबंधित घटनाएं जेहन में ताजी हो गर्इं। स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी मूलभूत आवश्यकता पूरी करना किसी भी देश और उसकी व्यवस्था की सबसे पहली जिम्मेदारी होती है। देश के प्रत्येक नागरिक के लिए यह मुहैया करवाना ही उस व्यवस्था की कामयाबी का मानक होना चाहिए। इस संदर्भ में मुझे एक बात याद आ रही है कि हमारे देश के युवा सरकारी स्कूल, सरकारी अस्पताल, सरकारी बस में जाना पसंद नहीं करते, मगर सरकारी नौकरी पाने के लिए जी-जान लगा देते हैं। इस कथन में यह बात निहित है कि क्या सरकारी होने पर उसकी गुणवत्ता पर प्रश्न लग जाता है?

अक्सर लोग बीमार होते है और उनके परिजन अगर आर्थिक रूप से सक्षम हैं तो मरीज को निजी क्लीनिक या अस्पताल में ले जाया जाता है। लेकिन इसके बाद महंगे बिल को लेकर चिंता भी जाहिर की जाती है। दरअसल, लोगों के पास विकल्प नहीं है। इसके लिए सरकार को चाहिए कि निजीकरण को मान्यता और बढ़ावा देने के बजाय सरकारी अस्पतालों या इस व्यवस्था के तहत चलने वाले संस्थानों की गुणवत्ता पर ध्यान दे। हमारी योजनाएं जो वर्तमान में चल रही हैं, वे जिस मंशा से शुरू की गई है, वह अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
जितना श्रम और ध्यान इन योजनाओं को बनाने में लगाया जाता है, उतना ही इनके क्रियान्वयन में भी लगाया जाए, क्योंकि अक्सर सरकारी योजनाओं के बारे में कहा जाता है कि वह ठीक ढंग से क्रियान्वित नहीं हो पाती है। अगर यह ईमानदारी से सुनिश्चित कर दिया जाए तो लोगों का निजी अस्पतालों या संस्थानों से मोह कम होगा। आज भी हमारे देश का एक बहुत बड़ा वर्ग सरकारी व्यवस्थाओं पर ही निर्भर है।
’प्रेरणा मालवीय, भोपाल

बस्ते का बोझ
मद्रास हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक सीबीएसई के स्कूलों में अब दूसरी कक्षा के बच्चों को होमवर्क देने पर रोक लगा दी गई है। अब सभी स्कूलों में बस्ते का वजन बच्चे का वजन से दस प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। केवल एनसीईआरटी का पुस्तकों को सिलेबस में शामिल करने को कहा गया है। कक्षा तीन तक आठ की जगह केवल तीन विषय ही पढ़ाया जाना चाहिए। मुझे लगता है यह आदेश सीबीएसई सहित तमाम स्कूलों में लागू होना चाहिए। मगर क्या इस आदेश का पालन कराया जा सकेगा? भारत में निजी स्कूल और अस्पतालों का दबदबा सरकार पर बना हुआ है। सरकार उनकी इच्छा के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं कर सकती हैं।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

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