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चौपाल : कानून से ऊपर

राजनीतिक दलों ने अब तक न तो आरटीआई के तहत मांगी गई किसी भी सूचना का जवाब दिया है और न ही सूचना आयोग द्वारा बुलाए जाने के बावजूद उनका कोई नुमाइंदा आयोग के सामने उपस्थित हुआ है।

Author June 2, 2018 3:49 AM
भारतीय चुनाव आयोग

देश के तमाम राजनीतिक दल चुनाव आयोग के उस फैसले से खुश हो सकते हैं जिसमें कहा गया है कि वे सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई) के दायरे में नहीं आते। यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। इसलिए भी कि केंद्रीय सूचना आयोग पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि सभी राष्ट्रीय दल इस कानून के तहत आते हैं। इस पूरे मामले को करीब से समझने के लिए पांच वर्ष पहले यानी तीन जून 2013 को लौट चलना पड़ेगा जब केंद्रीय सूचना आयोग ने राजनीतिक दलों को आरटीआई के अधीन लाने वाला ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। उस फैसले के बाद लोगों को लगा कि यह देश की राजनीति का कायाकल्प कर सकता है। मगर हुआ इसके विपरीत। राजनीतिक दलों ने उस फैसले को चुनौती भी नहीं दी और उस पर अमल करने से भी इंकार कर दिया। यह तो एक तरह की मनमानी ही है।

राजनीतिक दलों ने अब तक न तो आरटीआई के तहत मांगी गई किसी भी सूचना का जवाब दिया है और न ही सूचना आयोग द्वारा बुलाए जाने के बावजूद उनका कोई नुमाइंदा आयोग के सामने उपस्थित हुआ है। तब से लेकर अब तक किसी भी राजनीतिक दल ने इस फैसले का पालन करना तो दूर, इस दिशा में एक भी कदम बढ़ाने की जहमत नहीं उठाई है। इन सबको देखते हुए सूचना आयोग ने नाराजगी तो जताई है लेकिन खुद को बेबस और लाचार बताते हुए उसने भी अपने हाथ खड़े कर दिए हैं यह कहते हुए कि राजनीतिक दलों पर किसी भी तरह की कार्रवाई करने की शक्तियां उनके पास नहीं हैं। सूचना आयोग की लाचारी इस स्थिति को और भी भयावह बना देती है। राजनीतिक दल भले ही अपनी हर गतिविधि और फैसले के पीछे के कारण को सार्वजनिक न करें मगर कम से कम उन्हें अपने आय-व्यय की पूरी जानकारी तो ईमानदारी से देनी चाहिए। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि वे ऐसा करने से बच रहे हैं। तो क्या हम ऐसी स्थिति बनाने जा रहे हैं जहां राजनीतिक पार्टियां कानून तोड़ सकती हैं और उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा? कानून बनाने वाले ही अगर उसे तोड़ने लगे तो लोकतंत्र नहीं बचेगा।
’रोहित झा, पालम, नई दिल्ली

जख्मों पर नमक
तेल की बढ़ती कीमतों से देश में हाहाकार-सा मचा है लेकिन ‘बहुत हुई पेट्रोल-डीजल की मार, अबकी बार मोदी सरकार’ का नारा देकर सत्ता में आई सरकार चुप्पी साधे हुए है। उसके मंत्री और नेता तर्क दे रहे हैं कि तेल के भाव बाजार तय करता है इसलिए पिछले करीब 15 दिनों से तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में कर्नाटक चुनाव के दौरान तेल की कीमतों का स्थिर रहना शक पैदा करता है कि बाजार में तेल के दामों का उतार-चढ़ाव चुनाव को देख कर रुक क्यों जाता है? तेल के इस खेल में न केवल तेल कंपनिया बल्कि सरकार भी शामिल है। फिलहाल जनता सरकार अथवा तेल कंपनियों से राहत की उम्मीद के अलावा कुछ नहीं कर सकती। लेकिन तेल की कीमतों में 1 पैसा घटाकर तेल की मार झेल रही सरकार ने जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है।
’महेश कुमार, सिद्धमुख, राजस्थान

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