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चौपाल : उपचुनाव के संकेत

अब भाजपा को 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए फिर से मंथन करने की जरूरत पड़ेगी क्योंकि बिहार और उत्तर प्रदेश में हुए लोकसभा उपचुनाव परिणाम ने साबित किया है कि क्षेत्रीय दलों में अभी भी दमखम बचा है।

Author June 2, 2018 3:55 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फोटो सोर्स एक्सप्रेस के लिए ताशी)

कैराना लोकसभा सीट पर जाटों और मुसलिमों के वोट की जुगलबंदी के लिए विपक्ष ने जो दांव चला उससे भाजपा चित हो गई। कैराना उपचुनाव परिणाम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला, क्या मुजफ्फरनगर मॉड्यूल, जिसे उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत का सबसे बड़ा कारण बताया जाता है, वह फेल हो गया? दूसरा, कैराना के साथ ही नूरपुर विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार से यह सवाल उठता है कि गठबंधन 2019 तक ऐसा ही बना रहा तो क्या भाजपा की मुश्किलें बढ़ जाएंगी? चाहे गोरखपुर और फूलपुर हो या फिर कैराना उपचुनाव, विपक्षी दलों की दोस्ती ने भाजपा की जीत की गति पर ब्रेक लगाने का काम तो किया ही है। यह 2019 के आम चुनाव से पहले विपक्ष के लिए एक प्रेरक का काम करेगा। कैराना की जीत ने सियासी गणित को पूरी तरह उलझा दिया है। अब भाजपा को 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए फिर से मंथन करने की जरूरत पड़ेगी क्योंकि बिहार और उत्तर प्रदेश में हुए लोकसभा उपचुनाव परिणाम ने साबित किया है कि क्षेत्रीय दलों में अभी भी दमखम बचा है। भले लोकसभा और विधानसभा उपचुनाव स्थानीय मुद्दे पर आधारित होते हैं मगर जिस तरह विपक्ष ने 14 में 11 सीटों पर जीत दर्ज की है उसके कारण भाजपा की चिंता और बढ़ गई है। अगला चुनावी संग्राम ज्यादा दिलचस्प होने वाला है क्योंकि अब मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे महत्त्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं जहां भाजपा अपनी ही सरकारों को बचाने के लिए चुनाव मैदान में उतरेगी।
’पियूष कुमार, नई दिल्ली

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उपहास का परिहास

चंदन कुमार चौधरी की टिप्पणी ‘मजाक की चोट’ (दुनिया मेरे आगे, 24 मई) पढ़ी। सही है कि मजाक वही अच्छा जिससे किसी का दिल न दुखे। आमोद-प्रमोद का जीवन में बहुत महत्त्व है लेकिन जब यह किसी वर्ग विशेष को ध्यान में रख कर किया जाए तो अफसोसनाक होता है। भारत विविधताओं का देश है जहां कई धर्मों, जातियों और संप्रदायों के लोग रहते हैं। सबका अपना रहन-सहन और खान-पान की आदतें हैं। इस विविधता का हमें सम्मान करना चाहिए। एक संवेदनशील नागरिक के तौर पर यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी है। इसी कड़ी में मुझे एक स्कूल की घटना याद आ रही है जहां पारदी समुदाय के बच्चे भी पढ़ने आते थे। वहां सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान एक शिक्षक ने इन बच्चों पर तंज कसा कि दौड़ में तो ये बच्चे ही प्रथम आएंगे क्योंकि चोरी करके भागने की इनको आदत है। यह बात उन्होंने तब कही जब वे बच्चे वहीं खड़े थे। यह सुनकर उन्होंने अपनी गर्दन शर्म से झुका ली और पास खड़े अन्य सदस्य हंसने लगे।

यह उदाहरण इस बात की ओर संकेत करता है कि हमारे द्वारा किया गया मजाक या हंसी में कही गई बात किसी को अंदर तक कितना झकझोर देती है। यहां बात उन बच्चों की अस्मिता, उनकी पहचान और स्वाभिमान की है। हमारे यहां मजाक भी किनका बनाया जाता है! इस सूची में दलित, आदिवासी, समाज के कमजोर तबके के लोग और उसमें भी महिलाएं सबसे ऊपर होती हैं। आज के समय में अस्सी फीसद लतीफे इन्हीं पर होते हैं।
’प्रेरणा मालवीय, भोपाल

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