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तो इसलिए दलितों के घर जाकर भोजन कर रहे हैं बीजेपी नेता?

माना कि हमारे इतिहास में महापुरुषों का बहुत बड़ा योगदान है। लेकिन प्रतीकों की राजनीति पर बल देने के बजाय दलितों की स्थिति में सुधार के लिए बदलाव वाली राजनीति पर बल देना होगा।

Author May 8, 2018 4:46 AM
दलितों के सहारे भाजपा सत्ता में आने का दावा करती है, उनका उसे कोई खयाल नहीं है।

चौपाल: दरकती साख
जिन दलितों के सहारे भाजपा सत्ता में आने का दावा करती है, उनका उसे कोई खयाल नहीं है। यही वजह है कि आरक्षण, आंबेडकर की मूर्ति तोड़ना, दलित उत्पीड़न की घटनाएं और अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून को कमजोर करने जैसे मुद्दों के लेकर दलित समाज मे रोष व्याप्त है। ऐसे में दलितों के बीच दरकती साख को काबू करने के लिए भाजपा नेता दलितों के घर खाना खाने जा रहे हैं। खबरों के मुताबिक कई जगहों पर दलितों के घर वे नेता मेज से लेकर खाना और प्लेट तक अपना लेकर जा रहे हैं। दो रोटी खाकर तंगी में जीवन बिताने वाले गरीब दलित के घर जाकर होटल से तरह-तरह के लजीज पकवान खाना गरीबी का मजाक है। बल्कि इसे दलितों का अपमान क्यों नहीं कहा जाए? इस कथित प्रेम से दलितों को कुछ नहीं मिलने वाला है। माना कि हमारे इतिहास में महापुरुषों का बहुत बड़ा योगदान है। लेकिन प्रतीकों की राजनीति पर बल देने के बजाय दलितों की स्थिति में सुधार के लिए बदलाव वाली राजनीति पर बल देना होगा।
’महेश कुमार, सिद्धमुख, राजस्थान

कथनी करनी
केंद्र में काबिज मोदी सरकार को चार साल होने वाले हैं। देश-विदेश में सरकार की ख्याति पहले की किसी भी सरकार की तुलना में सबसे अधिक हुई है। कुछ दिन पहले मैं छुट्टी का उपयोग करते हुए इंटरनेट पर भाजपा का पिछला घोषणा-पत्र को पढ़ रहा था। उसमें एक से एक उत्कृष्ट वादे किए गए थे। अगर वे पूरे हो जाएं तो देश की जनता को फिर किसी और सरकार को चुनने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। मगर अफसोस कि इन चार सालों में उन वादों का कुछ नहीं हुआ। कथनी कुछ और थी करनी एकदम उलट। औरंगजेब, शाहजहां, पाकिस्तान, मुसलमान या जिन्ना। ये सब उस घोषणा-पत्र में नहीं थे। शासकीय विफलताओं को छिपाने और जनता से किए गए वादों पर उठने वालों सवालों को दबाने के लिए ही जिन्ना को याद किया जा रहा है। फिलहाल भाजपा जिन मुद्दों पर ध्रुवीकरण करना चाह रही है, वे नहीं होते तो भाजपा क्या करती?
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी

अंधविश्वास का जाल
भारत में लोग आस्था की दुनिया में जीते हैं। लेकिन ज्यादातर लोग अंधविश्वास के मकड़जाल में उलझे रहते हैं। इसका कुछ पाखंडी और ठग लोग नाजायज फायदा उठाते हैं। वे तब तक शायद लोगों को ठगते रहेंगे, जब तक लोग अंधविश्वास के जाल से बाहर नहीं निकल आते। भारत के बहुत से ऐसे गांव और शहर भी हैं, जहां कुछ लोग जादू-टोने से बीमारी का इलाज करने में विश्वास रखते हैं। जबकि यह किसी की जान पर भारी भी पड़ सकता है। माना जाता है कि महिलाएं ज्यादा अंधविश्वास का शिकार होती हैं। हालांकि यह पुरुषों की बनाई सुनियोजित व्यवस्था है, जिसमें महिलाओं को अशिक्षित और गैरजागरूक बनाए रखा जाता है। नतीजतन, कुछ भी ऐसा होता है जो महिलाओं को समझ में नहीं आता तो वे उसका हल चमत्कारों में ढूंढ़ती हैं। इसमें उन्हें अपना कीमती समय, धन और कई बार अपनी गरिमा को भी नुकसान पहुंचाना पड़ता है। बिना इस तरह के अंधविश्वास से बाहर निकले हालात में सुधार का कोई उपाय नहीं है।
’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

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