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चौपाल: जीएसटी की मार

दुनिया में अहिंसावादी बुद्ध के शाकाहारी देश के रूप में प्रचारित भारत में मांसाहारियों के लिए इतनी सहानुभूति क्यों कि उनके लिए मांस पर जीएसटी की दर शून्य है मगर गरीबों के बच्चों के खाने के बिस्कुट पर जीएसटी की दर 18 निर्धारित की है?

Author July 6, 2018 2:14 AM
यह तस्वीर प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल की गई है।

प्रधानमंत्री ने सही कहा है कि मर्सिडीज व दूध पर एक ही दर से कर (जीएसटी) नहीं लग सकता। लेकिन सरकार (वित्त मंत्रालय) ने जीएसटी का जो निर्धारण किया है, उसमें संतुलित दृष्टिकोण का नितांत अभाव है। जैसे मांस पर शून्य फीसद, सोने पर तीन फीसद, बिस्कुट पर 18 फीसद और ट्रैक्टर पर सर्वाधिक 28 फीसद जीएसटी लगाया गया है। आज भारत में ज्यादातर कृषि कार्य पुराने जमाने की तरह बैलों से न करा कर ट्रैक्टरों से ही किए जा रहे हैं। चाहे गरीब किसान हो या बड़े रकबे वाला किसान, सब समान रूप से ट्रैक्टर का प्रयोग कर रहे हैं। गरीब किसान, जिनके पास ट्रैक्टर खरीदने की क्षमता नहीं है, वे भी किराये पर अपने खेत की जुताई और बुआई ट्रैक्टरों से ही कराता है। ट्रैक्टर भारतीय कृषि और किसानों की मुख्य आवश्यकताओं में से एक है, जिसे वह पंपिंग सेट, माल ढुलाई और यातायात के साधन के तौर पर भी प्रयोग करता है। ऐसे में प्रश्न है कि सामान्य तौर पर आज जब भारतीय किसान इतना बदहाल और शोषित है कि आत्महत्या करने तक को मजबूर हो रहा है, तो सरकार ने क्या सोच कर खेती के अहम साधन ट्रैक्टर पर जीएसटी की सर्वोच्च दर 28 फीसद लगाई है?

दूसरा, दुनिया में अहिंसावादी बुद्ध के शाकाहारी देश के रूप में प्रचारित भारत में मांसाहारियों के लिए इतनी सहानुभूति क्यों कि उनके लिए मांस पर जीएसटी की दर शून्य है मगर गरीबों के बच्चों के खाने के बिस्कुट पर जीएसटी की दर 18 निर्धारित की है? एक अन्तिम प्रश्न, धनिकों के वैभव, ऐश्वर्य और संपन्नता के प्रतीक स्वर्ण पर जीएसटी की दर सिर्फ तीन फीसद क्यों है? अच्छा होता कि बिस्कुट और ट्रैक्टरों पर जीएसटी की दर शून्य प्रतिशत रखी जाती और मांस और स्वर्ण पर सर्वाधिक रखी जाती।
’निर्मल कुमार शर्मा, प्रताप विहार, गाजियाबाद

बदहाल बैंक
सरकारी क्षेत्र के बैंकों की हालत दिन पर दिन खराब होती जा रही है। उनका एनपीए लगातार बढ़ रहा है। कारण है कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की कमी। केंद्र सरकार ने इन बैंकों की माली हालत सुधारने के लिए अतिरिक्त पूंजी देने की घोषणा की है। तमाम बैंकों का चार या पांच बड़े बैंकों में विलय करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। बावजूद इसके उनका भविष्य सुरक्षित जान नहीं पड़ता। इसीलिए शायद आइडीबीआइ बैंक का एक बड़ा हिस्सा भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआइसी) को सौंपा जा रहा है। इतना ही नहीं, इसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी को भारतीय रिजर्व बैंक में स्थानांतरित किया गया है। दरअसल, एलआइसी पर अतिरिक्त बोझ नहीं डाला जाना चाहिए। माना कि वह समृद्ध है मगर कितने बीमार को सम्हाल सकेगा? कुछ दिन पूर्व ही उसने कोल इंडिया को ‘बेलआउट’ पैकेज दिया था। कल अन्य बैंक भी मांग करेंगे कि एलआईसी उन्हें भी मदद करे। इस प्रकार तो खुद एलआईसी भी बीमार हो जाएगा।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी

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