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चौपाल: तबाही से सबक

केरल में आई बाढ़ उत्तराखंड, मुंबई या चेन्नई में पिछले दशक में अपनी जगह के लिए इंसानों को किनारे पर ढकेलते पानी के कारण पैदा उपजी आपदा से बिलकुल भी अलग नहीं है। इन सभी इलाकों में पानी ने अपनी जगह वापस पाने के लिए इंसानों और उनके ‘विनाशकारी विकास’ को बुरी तरह किनारे कर दिया है।

Author August 28, 2018 2:37 AM
Kerala Floods : केरल के एक बाढ़ग्रस्‍त इलाके ही हवाई तस्‍वीर। (Photo : PTI)

दक्षिण भारत का खूबसूरत राज्य केरल पिछले दिनों आई भीषण बाढ़ से लगभग तबाह हो गया है। जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाने के प्रयास शुरू किए जा चुके हैं। इसी क्रम में केंद्र सरकार ने छह सौ करोड़ रुपए जारी किए हैं हालांकि यह राशि अत्यंत कम है क्योंकि केरल सरकार ने लगभग दो हजार करोड़ के अनुमानित नुकसान की बात कही है। केरल में इस साल तीस मई से मानसूनी बारिश ने जो कहर ढाना शुरू किया उसने मध्य अगस्त तक आते-आते भयंकर बाढ़ का रूप ले लिया। करीब सौ वर्षों की इस सबसे विनाशकारी बाढ़ की मार झेल रहे केरल में अब बाकी है तो केवल तबाह हुए या सूने पड़े घर और लोगों की आंखों में बसा विनाश का मंजर। इस तबाही का कारण केवल बारिश नहीं बल्कि पर्यावरणविदों के मुताबिक अवैध निर्माण भी है जो खुलेआम हो रहा था। मौसम में बदलाव सिर्फ केरल में नहीं बल्कि पूरे देश में हुआ है। अगर पर्यावरण के प्रति हम असंवेदनशील रवैया कायम रखेंगे तो ऐसी आपदाएं आती रहेंगी।

केरल में आई बाढ़ उत्तराखंड, मुंबई या चेन्नई में पिछले दशक में अपनी जगह के लिए इंसानों को किनारे पर ढकेलते पानी के कारण पैदा उपजी आपदा से बिलकुल भी अलग नहीं है। इन सभी इलाकों में पानी ने अपनी जगह वापस पाने के लिए इंसानों और उनके ‘विनाशकारी विकास’ को बुरी तरह किनारे कर दिया है। केरल की बाढ़ इंसान और पानी के बीच जगह की लड़ाई का सबसे ताजा उदाहरण है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे इंसानों और जंगली जानवरों के बीच जंगल के लिए होने वाली लड़ाई होती है। अभी कुछ साल पहले उत्तराखंड में आई आपदा का मुख्य कारण भी संवेदनशील उच्च हिमालयी क्षेत्रों में अंधाधुंध विकास था। बहुत तीव्र गति से हो रहे निर्माण कार्य जब प्रकृति से खिलवाड़ करते हैं तो ऐसा ही विनाश का स्वरूप सामने आता है।

पहाड़ी इलाकों में धड़ल्ले से निर्माण कार्य और ढलानों पर बनी इमारतों ने नदियों और नहरों के रास्ते संकरे कर दिए हैं। नदियों के पानी को बहने के लिए जगह ही नहीं बची है। ऐसा नहीं है कि नदियों और नहरों के पास निर्माण कार्य को सीमित करने के लिए कोई कानून नहीं है। हाल ही में भूमि और आपदा प्रबंधन संस्थान के प्रमुख ने एक साक्षात्कार में बताया कि ‘हमने कई राज्यों से 2004 में ही संपर्क किया था और कहा था कि बाढ़ वाले इलाकों को जोनों में बांट दिया जाए, लेकिन न तो केरल और न किसी अन्य राज्य ने इस बारे में कोई दिलचस्पी दिखाई।’ हकीकत यह है कि नदियां तो अपने रास्ते पर ही हैं, हम ही विकास की चकाचौंध में इतने अंधे हो चुके हैं कि नदियों के रास्ते में इमारतें बना रहे हैं। यही वजह है कि इमारतें बाढ़ में बही जा रही हैं। ऐसे में केंद्र और राज्यों की सरकारों तथा स्वयंसेवी संगठनों को मिलकर एक दीर्घकालिक रणनीति के तहत आपदा प्रबंधन पर कार्य करना होगा वरना कल उत्तराखंड, आज केरल, कल फिर कोई और राज्य इस आपदा का शिकार होता रहेगा।
’अपूर्व वाजपेयी, शाहजहांपुर

आपदा प्रबंधन
इन दिनों जिस तरह जलवायु परिवर्तन हो रहा है उसके मद्देनजर आपदा प्रबंधन एक महत्त्वपूर्ण विषय के रूप में उभरा है। केरल की बाढ़ कहीं न कहीं पारिस्थितिकी असंतुलन की ओर संकेत है लिहाजा अब जरूरी हो गया है कि देश में आपदा प्रबंधन के दायरे का विस्तार किया जाए। आपदाएं अब मौसम आधारित न होकर वर्षभर कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में आती रहती हैं। भारी बारिश, बाढ़, भूस्खलन, बादल फटना, जंगलों में आग लगना, सूखा पड़ना आम हो चला है। इसे देखते हुए सरकार को नए सिरे से ‘आपदा-प्रबंधन’ विषय को शैक्षिक पाठ्यक्रम में शामिल कर इसके बारे में प्रचार-प्रसार करना चाहिए। आपदाओं के समय बचाव, सुरक्षा और प्रबंधन से सभी का अवगत होना अब जरूरी हो गया है। आज संपूर्ण विश्व पर्यावरणीय समस्याओं से ग्रस्त है इसलिए आवश्यकता है कि ‘आर्थिक जीडीपी’ के स्थान पर ‘पर्यावरणीय जीडीपी’ की बात की जाए। तेजी से बढ़ते पारिस्थितिकी असंतुलन को देखते हुए वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आपदा प्रबंधन के प्रति गंभीर होने की आवश्यकता है।
’रचित पंडया, जयपुर

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