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चौपाल: करिश्माई नेता

जयललिता के बाद करुणानिधि जैसे करिश्माई नेता के जाने के बाद तमिलनाडु की राजनीति थोड़ी खाली नजर आ रही है, क्योंकि आज के समय वहां के लोगों में शायद ही उतना प्रेम और विश्वास और किसी दूसरे राजनेता के लिए होगा।

Author Published on: August 10, 2018 2:22 AM
डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि। (फाइल फोटो)

आजादी के बाद हमारे देश में बहुत सारे राजनेता उभरे, जिन्होंने समाज कल्याण के लिए काम किया। मगर मुथुवले करुणानिधि बाकी सभी राजनेताओं से थोड़े अलग इसलिए हैं कि उन्होंने न सिर्फ सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठा कर विधवा पुनर्विवाह, मद्यपान निषेध और जमींदारी उन्मूलन जैसे मसलों के समर्थन में खड़े रहे, बल्कि उन्होंने तमिल भाषा को नए आयाम तक पहुंचाने का काम भी किया। जयललिता के बाद करुणानिधि जैसे करिश्माई नेता के जाने के बाद तमिलनाडु की राजनीति थोड़ी खाली नजर आ रही है, क्योंकि आज के समय वहां के लोगों में शायद ही उतना प्रेम और विश्वास और किसी दूसरे राजनेता के लिए होगा। उत्तर भारत की राजनीति के उलट दक्षिण क्षेत्र की राजनीति में फिल्मी कलाकार, साहित्यकार, कवि और लेखन के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को वहां की जनता के बीच अच्छी-खासी प्रसिद्धि मिली है। चाहे वे एमजी रामचंद्रन हों, जयललिता या फिर करुणानिधि जैसे राजनेता हों।

हाल के कुछ वर्षों में दो सुपर स्टार रजनीकांत और कमल हसन तमिलनाडु की राजनीति में जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसमें कोई संशय नहीं है कि तमिलनाडु के लोग रजनीकांत को बहुत ज्यादा सम्मान देते रहे हैं। एक तरफ तमिलनाडु की जनता अपने नए करिश्माई राजनेता को ढूंढ़ रही होगी, वहीं देश के मुख्य राजनीतिक पार्टियां कांग्रेस और भाजपा भी अपने पैर तमिलनाडु की राजनीति में फैलाने को बेताब होंगी। अब देखना है कि आने वाले दिनों में तमिलनाडु की राजनीति में किस चेहरे को नायक के तौर पर स्वीकार किया जाता है।
’पीयूष कुमार, नई दिल्ली

उम्मीदों पर पानी
हाल ही में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने नौकरियां नहीं होने की बात को जिस प्रकार स्वीकार किया, वह सरकार की बड़ी विफलता को दर्शाता है। जिन्होंने चुनाव के समय वादा किया था कि अगर हम सत्ता में आए तो हर साल एक करोड़ युवाओं को रोजगार मुहैया कराएंगे, वही आज रोजगार नहीं होने की बात कर रहे हैं। यह देश के उन नौजवानों के साथ धोखा नहीं तो और क्या है, जिन्हें सत्ता परिवर्तन से एक आस जगी थी कि अब कुछ बेहतर होगा। बड़े तामझाम के साथ स्टार्ट-अप इंडिया, स्किल इंडिया आदि को शुरू किया गया था, लेकिन उसका भी कोई फायदा देखने को नहीं मिल रहा। जो रोजगार पहले से मौजूद थे, उसे भी नोटबंदी एवं जीएसटी ने काफी नुकसान पहुंचाया। सरकार पिछले चार सालों में बेमानी बयानों और काम को छोड़ कर एक ठोस रणनीति के साथ जनता के मुद्दों पर कार्य करती तो आज रोजगार की कमी नहीं होती। रोजगार के अवसर पैदा करना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है।
’हिफजुर रहमान रिंकु, शेरघाटी, गया

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