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चौपाल: संसाधनों का अपव्यय

पिछले तीन दशकों में अर्थ ऑवर शूट डे पीछे होते-होते 19 दिसंबर से एक अगस्त आ पहुंचा है जो कि बेहद चिंताजनक तथ्य है। यह तथ्य हमारी विकास की अवधारणा पर कुठाराघात करता नजर आ रहा है।

Author August 4, 2018 2:00 AM
सांकेतिक तस्वीर (Image Source: NASA)

मानव लगातार पृथ्वी के संसाधनों का जरूरत से ज्यादा अंधाधुंध दोहन कर रहा है। यही कारण है कि वर्ष 2018 का ‘अर्थ ऑवर शूट डे’ एक अगस्त को ही आ गया। अर्थात पृथ्वी द्वारा वर्ष भर में पुनरुत्पादित किए जा सकने वाले प्राकृतिक संसाधनों को मानव ने इस वर्ष 7 महीने में ही समाप्त कर दिया है। यह बिलकुल उसी तरह है जैसे कोई परिवार महीने भर के राशन को माह के 18 वें दिन ही समाप्त कर दे। ‘अर्थ ऑवर शूट डे’ के सिद्धांत को सर्वप्रथम ब्रिटेन की एक संस्था न्यू इकोनॉमिक्स फाउंडेशन के एंड्रयू सिम्स ने दिया था। तब से न्यू इकोनॉमिक्स फाउंडेशन का एक साझेदार संगठन ‘ग्लोबल फुटप्रिंट नेटवर्क’ हर साल अर्थ ऑवर शूट डे के लिए अभियान चला कर धरती के सीमित संसाधनों के प्रति लोगों के बीच जागरूकता फैलाता है। ग्लोबल फुटप्रिंट नेटवर्क मानव की मांग और प्राकृतिक संसाधनों व पर्यावरणीय सुविधाओं की उपलब्धता का आकलन करता है।

हम साल दर साल मछलियों के अत्यधिक शिकार, वनों की अंधाधुंध अनावश्यक कटाई, गैर जरूरी मात्रा में जैव र्इंधन जला कर वातावरण द्वारा अवशोषित किए जाने की क्षमता से अधिक कार्बन उत्सर्जन करके पृथ्वी द्वारा साल भर में पुनरुत्पादित किए जाने वाले संसाधनों को समय के पहले खत्म करते आ रहे हैं। पिछले तीन दशकों में अर्थ ऑवर शूट डे पीछे होते-होते 19 दिसंबर से एक अगस्त आ पहुंचा है जो कि बेहद चिंताजनक तथ्य है। यह तथ्य हमारी विकास की अवधारणा पर कुठाराघात करता नजर आ रहा है। हम आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसी पृथ्वी छोड़ना चाहते हैं, आज यह ज्वलंत प्रश्न बन कर उभर रहा है।

ऐसी परिस्थिति के बनने और लगातार बिगड़ने का सबसे बड़ा कारण मौजूदा उपभोक्तावादी संस्कृति है। लोग ज्यादा से ज्यादा आराम और सुविधाओं की चाह में संसाधनों काअत्यधिक अपव्यय कर रहे हैं। जहां एक चीज की जरूरत है वहां चार चीजों का उपयोग करना प्रतिष्ठा या हैसियत का सूचक बना लिया है। क्रय शक्ति बढ़ जाने के कारण लोग जैव र्इंधन का बहुत ही गैर जिम्मेदाराना तरीके से दुरुपयोग बड़ी सहजता से यह कहते हुए करते देखे जाते हैं कि आपको क्या, हम अपने पैसे खर्च कर रहे हैं! यही मानसिकता कमोबेश हर जगह के हर उपभोक्ता में घर कर गई है। ऐसे उपभोक्ताओं को पृथ्वी की सेहत और पर्यावरण की हानि जैसे मुद्दों से दूर-दूर तक कोई मतलब नहीं है। लोगों को ऐसी मानसिकता से बाहर आना होगा। जागरूक होकर आने वाली पीढ़ियों के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। वर्तमान के उपभोग और भविष्य के नुकसान के बीच के संबंध को समझना होगा। अत्यावश्यक और संतुलित उपभोग से ही हम पृथ्वी को संभलने का अवसर दे पाएंगे। पृथ्वी से ही हम हैं। पृथ्वी के नुकसान से कोई भी खुद को अलग नहीं रख सकता!
’ऋषभ देव पांडेय, जशपुर, छत्तीसगढ़

मैली सोच
आजकल बलात्कार या यौन शोषण की आठ-दस घटनाएं रोज हमारे संज्ञान में आती हैं। कभी-कभी तो ये अत्यंत हृदयविदारक होती हैं। अफसोस की बात है कि समाज के कुछ गलत सोच वाले लोग महिलाओं को महज वस्तु समझते हैं। इस सोच को बदलने की जरूरत है। हमें बच्चों को अच्छे संस्कार देने चाहिए। पीड़िताओं के प्रति महज सहानुभूति प्रकट करने के बजाय ठोस कदम उठाने की जरूरत है। जब बदलेगी सोच तभी तो बदलेगा देश।
’सुधांशु शेखर, दिल्ली

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