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चौपाल: हादसे के रास्ते

निजी विद्यालयों में चाहे अध्यापक हों या वाहन चालक या कोई अन्य, उनकी नियुक्ति के मापदंडों का कड़ाई से पालन होना चाहिए। एक खास बात यह कि स्कूल प्रशासन या परिवहन विभाग कभी यह देखने का प्रयास नहीं करते कि चालक किस गति से स्कूल वैन चलाता है।

Author May 12, 2018 04:51 am
हमारे देश में रेलवे क्रासिंग पर दुर्घटनाएं कोई नई बात नहीं हैं लेकिन उनसे कितनी सीख ली जाती है यह विचारणीय है। (Source: Express Photo by Praveen Khana)

हमारे देश में रेलवे क्रासिंग पर दुर्घटनाएं कोई नई बात नहीं हैं लेकिन उनसे कितनी सीख ली जाती है यह विचारणीय है। हादसा होने पर कुछ दिन अखबारों में उसकी चर्चा रहती है, फिर सब भुला दिया जाता है। कभी इस बात पर विचार होता ही नहीं कि ऐसी दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। आजकल तमाम स्कूलों के वाहन चालक ईयरफोन तो लगाते ही हैं, उनकी रफ्तार देखकर भी डर लगता है। बहुतों के पास ड्राइविंग लाइसेंस होता भी है कि नहीं! कुशीनगर के बाद देश या प्रदेश में ऐसी दुर्घटना नहीं होगी इसकी कोई गारंटी नहीं है। मुख्य रूप से देखा जाए तो इसमें गलती रेलवे और स्कूल प्रशासन दोनों की है। प्रत्येक रेल क्रासिंग पर कर्मचारी का होना सुनिश्चित किया जाना चाहिए। निजी विद्यालयों में चाहे अध्यापक हों या वाहन चालक या कोई अन्य, उनकी नियुक्ति के मापदंडों का कड़ाई से पालन होना चाहिए। एक खास बात यह कि स्कूल प्रशासन या परिवहन विभाग कभी यह देखने का प्रयास नहीं करते कि चालक किस गति से स्कूल वैन चलाता है। आजकल स्कूलों के खुलने-बंद होने के समय उनके वाहन चालकों की गति देख कर आशंका होती है कि कोई अनहोनी न हो जाए। अकसर वे बहुत जल्दी में होते हैं और शायद घर से भी देर से निकलते हुए सोचते हैं कि रफ्तार बढ़ा कर वक्त से पहुंच जाएंगे। इसी चक्कर में सब गड़बड़ हो रहा है। रफ्तार जांचने की व्यवस्था भी गुपचुप तरीके से कभी-कभी स्कूल प्रशासन को करनी चाहिए।
’राजेंद्र प्रसाद बारी, इंदिरा नगर, लखनऊ

दुधारी तलवार

ईमानदार लोगों के लिए यह दुनिया बेगानी होती जा रही है। न इनकी कद्र है और न इनके लिए जगह है। बात यहीं तक रहती तब भी गनीमत थी मगर अब यह दुनिया ईमानदार लोगों के लिए खतरनाक भी हो चली है। ईमानदार आदमी बेईमानों के लिए एक मजाक सरीखा होता है लिहाजा, उसे इतना प्रताड़ित किया जाता है कि या तो वह विक्षिप्त हो जाता है या उस दुनिया में चला जाता है जो बेईमानों की पहुंच से बाहर होती है। विडंबना देखिए कि हम सब एक साफ-सुथरा समाज तो चाहते हैं लेकिन एक साफ-सुथरे आदमी से परहेज करते हैं क्योंकि वह सामाजिक लोगों के गणित में फिट नहीं बैठता। एक जुगाडू जनप्रतिनिधि पैसों के दम पर लोकसभा या विधानसभा का चुनाव जीत जाता है लेकिन एक ईमानदार व्यक्ति पहले तो चुनाव में खड़ा ही नहीं होता और यदि होता भी है तो उसकी जमानत जब्त हो जाती है। दरअसल, हम ईमानदारों की इस जंग में ईमानदारी से शामिल नहीं हैं।

राजनीति भी इसी समाज से आती है। तभी तो ‘व्हिसल ब्लोअर्स’ को सुरक्षा देने वाला विधेयक लोकसभा में पास हो जाने के बाद राज्यसभा में पेश होने का इंतजार ही कर रहा है। इसे पास कराने की जल्दी न राजनीति को है न समाज को है। हम अपनी पसंद के दल के भ्रष्टाचार से आंखें मूंद लेते हैं लेकिन विरोधी दल के भ्रष्टाचार पर सवाल उठाते हैं। हम आईपीएल जैसे तमाशे में पैसा देकर भीड़ बन जाते हैं मगर ईमानदारी और सत्य के लिए मुंह तक नहीं खोलते। हमारे इसी दोगलेपन की दुधारी तलवार पर ईमानदार अफसरों की गर्दनें कट रही हैं।
’संतोष कुमार, बाबा फरीद कॉलेज, बठिंडा

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