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चौपाल: सूचना से खौफ

जब 2005 में सूचना का अधिकार कानून लागू हुआ था तो इसे आमजन के हाथ में भ्रष्टाचारियों के खिलाफ एक अचूक हथियार करार दिया गया था। शुरू के चंद महीनों में लगा भी कि यह एकदम सही दिशा में जा रहा है। मगर ज्यों-ज्यों वक्त बीतता गया त्यों-त्यों व्यवस्था के कर्ताधर्ताओं ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया।

Author July 21, 2018 2:05 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फाइल फोटो)

जब 2005 में सूचना का अधिकार कानून लागू हुआ था तो इसे आमजन के हाथ में भ्रष्टाचारियों के खिलाफ एक अचूक हथियार करार दिया गया था। शुरू के चंद महीनों में लगा भी कि यह एकदम सही दिशा में जा रहा है। मगर ज्यों-ज्यों वक्त बीतता गया त्यों-त्यों व्यवस्था के कर्ताधर्ताओं ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। नतीजा यह कि जुलाई के प्रथम सप्ताह में बिहार के जमुई जिले में आरटीआई कार्यकर्ता वाल्मीकि यादव और उनके सहयोगी धर्मेंद्र यादव की हत्या कर दी गई। कहते हैं कि अब तक सत्तर से अधिक हत्याएं हो चुकी हैं। ग्यारह लाख से अधिक सूचनार्थ दिए गए आवेदन अनुत्तरित हैं। हजारों कार्यकर्ताओं को झूठे मुकदमों में फंसा दिया गया है। एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा! केंद्र सरकार इस सूचना के अधिकार अधिनियम में संशोधन के लिए सदन में बिल लेकर आई है। मंशा साफ है। बिना भ्रष्टाचार के राजनीति का पेशा फायदेमंद नहीं हो सकता! चाहे वह कोई भी विचारधारा हो, उसे सत्ता चाहिए, अधिकार चाहिए, पैसा चाहिए। जाहिर है, कोई नहीं चाहेगा कि ऐसा कानून हो जो उसके मार्ग में रोड़ा बन जाए।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी

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स्कूलों में अपराध
इन दिनों देश के विद्यालयों से बाल अपराध की खबरें लगातार आना बहुत चिंताजनक है। ‘छात्र ने की प्राचार्या की हत्या’, ‘साथी छात्र ने चाकू से गोदा’, ‘विद्यालय से बाहर अध्यापक की छात्रों द्वारा पिटाई’ जैसी खबरें अखबारों की सुर्खियों में रहती हैं। यूनेस्को के आंकड़ों के मुताबिक अन्य देशों के मुकाबले भारत के विद्यालयों में अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। आखिर इन अपराधों के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या विद्यार्थी, विद्यालय प्रशासन, अध्यापक या माता-पिता और परिवार?

प्राचीन भारत को विश्व गुरु बनाने में यहां के गुरुओं का विशेष योगदान रहा था लेकिन आज उस योगदान में गिरावट को साफ देखा जा सकता है। विद्यालय प्रशासन द्वारा अध्यापकों को परीक्षा परिणाम अच्छा लाने के लिए विशेष प्रयास करने की हिदायत दी जाती है, चाहे इसकी कीमत छात्रों के नैतिक स्तर में गिरावट ही क्यों न हो। इसलिए कक्षा में अध्यापक केवल अपने विषय के बारे में बात करते हैं। विद्यार्थियों का नैतिक स्तर उठाने के लिए विद्यालयों के पास कोई कार्यक्रम नहीं होता क्योंकि उनके लिए अंकों की शिक्षा ज्यादा महत्त्वपूर्ण है बजाय समाज के लिए एक अच्छा नागरिक तैयार करने के। आखिर इस तरह की शिक्षा प्रणाली देकर हम देश के विद्यार्थियों से कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वे नैतिक धर्म को निभाने वाले बनेंगे? समाज के लिए एक अच्छा इंजीनियर, डॉक्टर या अधिकारी बनाने से पहले अच्छा नागरिक बनाना ज्यादा जरूरी है।
’दीपक मलिक, प्रताप स्कूल, खरखौदा

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