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चौपाल : महंगाई का तेल

पेट्रोल की बात अगर करें तो 16 अगस्त 2013 को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 111 डॉलर प्रति बैरल था। मौजूदा वक्त में यह 80 डॉलर प्रति बैरल है, अर्थात 40 फीसद सस्ता। तो जब 111 डॉलर का भाव था तो पेट्रोल डीलर को 52.15 रुपए पड़ता था और अब पड़ता है 37.22 रुपए।

Author Published on: May 26, 2018 3:49 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

सरकार कभी कहती है कि हमने पेट्रोल और डीजल पर टैक्स बढ़ा कर उससे जुटाया पैसा किसानों को दिया तो कभी कहती है कि हम ‘बफर स्टॉक’ तैयार कर रहे हैं। कभी कहती है कि राज्य सरकारें अपने कर कम क्यों नहीं करतीं? आज बीस राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं; वे जिस दिन चाहें 20 राज्यों की जनता को राहत दे सकती हैं। तो क्या यह बहानेबाजी जनता के गुस्से और आक्रोश से बचने का पैंतरा भर है? यह महज विडंबना ही हो सकती है कि जिस पड़ोसी देश नेपाल को सारा पेट्रोल और डीजल भारत सप्लाई करता है वहां पेट्रोल अभी 68 रुपए प्रति लीटर बिक रहा है और भारत में पेट्रोल सबसे अधिक मुंबई में 84 रुपए प्रति लीटर है। राज्यों के टैक्स के नाम पर सरकारों की होशियारी को समझने की जरूरत है क्योंकि पेट्रोल और डीजल उसके लिए वह दुधारू गाय है जिसे जितना चाहो दुहा जा सकता है।

पेट्रोल की बात अगर करें तो 16 अगस्त 2013 को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 111 डॉलर प्रति बैरल था। मौजूदा वक्त में यह 80 डॉलर प्रति बैरल है, अर्थात 40 फीसद सस्ता। तो जब 111 डॉलर का भाव था तो पेट्रोल डीलर को 52.15 रुपए पड़ता था और अब पड़ता है 37.22 रुपए। मतलब सीधे तौर पर 14.83 रुपए सस्ता मिलता है डीलर को। अब असली तेल के खेल को देखिए कि पहले केंद्र का टैक्स था 9.48 रुपए लेकिन जब मौजूदा राजग सत्ता में आया तो इसे बढ़ाते-बढ़ाते केंद्र के टैक्स को कर दिया 19.48 रुपए यानी केंद्रीय कर दोगुने से भी ज्यादा हो गया। इसके मुकाबले राज्यों का टैक्स 12.68 रुपए था, यह अब हो गया है 16.20 रुपए। इस पर डीलर का कमीशन तब लगता था 1.79 रुपए और अब लगता है 3.62 रुपए। नतीजा, तेल 111 डॉलर के कच्चे तेल के जमाने में 76.10 रुपए मिल रहा था और 80 डॉलर के जमाने में 76.61 रुपए का मिल रहा है!

क्या यह सच नहीं कि कर्नाटक चुनाव के दौरान एक पखवाड़े से भी अधिक समय तक पेट्रोल और डीजल के दामों में कोई वृद्धि नहीं की गई? क्या कर्नाटक का चुनाव खत्म होते ही जनता की परेशानियों और समस्याओं का हल सरकार की प्राथमिकता नहीं रह गया? या फिर जनता को तेल की कीमतों से राहत के लिए किसी अगली चुनावी तारीख का इंतजार करना पड़ेगा? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो आज देश का हर एक नागरिक पूछ रहा है और जवाब मिल नहीं रहा।
’रोहित झा, पालम, नई दिल्ली

हमारा दायित्व
मनुष्य द्वारा अपने स्वार्थ के लिए पर्यावरण के साथ की जाने वाली छेड़छाड़ से प्रकृति का संतुलन तेजी से बिगड़ता जा रहा है। लगातार पेड़ों का कटाव, भूमि का दुरुपयोग व जल को प्रदूषित करने के साथ-साथ उसका अपव्यय, इस सबके चलते आने वाले समय में हमारा जीवन खतरे में पड़ना तय है। पर्यायवरण संरक्षण के प्रति लोगों के जागरूक बनाए रखने के लिए हर वर्ष पांच जून को विश्व पर्यायवरण दिवस मनाया जाता है, लेकिन यह प्रयास भी विफल होता नजर आ रहा है। यह हमारा पर्यायवरण है, लिहाजा इसे साफ-सुथरा रखना भी हमारा दायित्व है।
’मोना कपूर, दिल्ली

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