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चौपाल: लाइलाज बीमारी

आज जिस तरह बैंकों में गड़बड़-घोटालों की खबरें सुर्खियां बन रही हैं, उन्होंने तो आर्थिक भ्रष्टाचार की जानलेवा बीमारी की नोटबंदी जैसी कड़वी दवा को भी बेअसर कर दिया है।

Author March 26, 2018 03:54 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (पीटीआई फोटो)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में से आर्थिक भ्रष्टाचार की जानलेवा बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए नोटबंदी के टॉनिक का इंतजाम किया था और देश को बैंकों से जोड़ने का प्रयास किया था, ताकि कोई भी कालेधन को अपनी तिजोरी की शान बना कर न रख पाए। लेकिन आज जिस तरह बैंकों में गड़बड़-घोटालों की खबरें सुर्खियां बन रही हैं, उन्होंने तो आर्थिक भ्रष्टाचार की जानलेवा बीमारी की नोटबंदी जैसी कड़वी दवा को भी बेअसर कर दिया है। बैंकों में भ्रष्टाचार के नित-प्रतिदिन खुलासों को देख, पढ़ और सुन कर तो यही लगता है कि यहां अब आर्थिक भ्रष्टाचार की बीमारी लाइलाज बन चुकी है, जिसका अंत कोई चमत्कार ही कर सकता है।
’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

जीवन की बूंद
जल दिवस आया और सरकारी महकमों और संस्थानों ने इसे रस्म अदायगी के तौर पर मना भी लिया, पर हम हैं कि इस भयंकर वास्तविकता को मानने को तैयार नहीं कि हमारे पूर्वजों ने भी अगर जल का अंधाधुंध दोहन किया होता तो आज हमें जल उपलब्ध नहीं होता। हमारी आने वाली पीढ़ी जल दिवस पर होने वाले भाषणों से तो अपनी प्यास नहीं बुझा पाएगी। आने वाले समय में अगर विश्व युद्ध जैसी स्थिति आई तो उसकी एक मुख्य वजह जल ही होगा। हालत यह है कि आज दुनिया की आधी आबादी को पीने के लायक स्वच्छ जल नहीं मिल रहा है, जल जनित बीमारियों का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। भारत में तो स्थिति और गंभीर है जहां नदियों को देवी का दर्जा दिया जाता है मगर उन्हें दूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। हम महानगरों-शहरों में रहने वाले स्थिति की गंभीरता नहीं समझते क्योंकि पानी आसानी से उपलब्ध है। अगर सात से आठ दिन पानी की सप्लाई बंद हो जाए तो दिन में ही तारे नजर आने लग जाएंगे। जल बिन जीवन नहीं, यह हम जानते हैं। इस जीवन की एक-एक बूंद को बचाना हमारा दायित्व है। अपने बच्चों का भविष्य हमें सुधारना है तो पहल हमें ही करनी होगी। एक छोटी-सी पहल एक मुहिम बन सकती है।
’शिल्पा जैन सुराणा, वारंगल

सख्ती की जरूरत
स्वच्छता को एक अभियान, नारे और अब सेवा का नाम देने वाली सरकार ने जनता को उपदेशात्मक रूप से एक हवाई आदर्श तो थमा दिया लेकिन जमीनी तौर पर योजनाबद्ध तरीके से अस्वच्छता की समस्या का हल नहीं ढूंढ़ा गया, न लोगों के सामने प्रस्तुत किया गया। किसी भी दिशा में जनता का आह्वान करने से पहले प्रशासन को स्वयं चुस्त-दुरुस्त होना पड़ता है लेकिन दिल्ली जैसे शहर में ही स्वच्छता के दावे थोथे नजर आ रहे हैं। यहां सड़कों पर खुले कूड़ेदान, नालों और यमुना में बढ़ता कूड़ा, लैंडफिलों के ढहते पहाड़ इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। दिल्ली के किसी भी क्षेत्र में सूखे और गीले कूड़े के अलग-अलग निपटान के लिए समुचित प्रयास नहीं किए गए, न लोगों को ऐसा करने के सख्त आदेश दिए गए।
शहर में पॉलीबैग और प्लास्टिक के प्रयोग पर प्रतिबंध के लिए कड़े कदम नहीं उठाए गए। यदा-कदा धीमे स्वरों में ऐसे आदेशों की चर्चा सुनाई तो देती है लेकिन उन पर वांछित अमल कभी नहीं होता। दिवाली पर पटाखे न जलाने का आग्रह तो सुनाई पड़ता है लेकिन शहर को घातक प्रदूषण की मार से बचाने के लिए उठाए जाने वाले सख्त प्रतिबंध कहीं नजर नहीं आते। यह भी सर्वविदित है कि केवल आदेश जारी कर देना काफी नहीं, बल्कि उन पर सख्ती से अमल कराना भी प्रशासन का दायित्व है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी आधारभूत आवश्यकताओं में समझौते की कोई गुंजाइश नहीं होती। आज हालत देखकर लगता है कि प्रशासन इतना अक्षम हो चुका है कि दिल्ली जैसे शहर में लोगों से कुछ अनिवार्य नियमों का पालन भी नहीं करा पा रहा जो कि सबकी भलाई के लिए जरूरी हैं।
’सुमन, प्लेटिनम एनक्लेव, रोहिणी, दिल्ली

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