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जब 1971 के आंतरिक विद्रोह और मजूमदार की मृत्यु से भटक गई नक्सलवादियों विचारधारा

सामाजिक जागृति के लिए शुरू हुए इस आंदोलन पर कुछ सालों के बाद राजनीति का वर्चस्व बढ़ने लगा और यह जल्द ही अपने मुद्दों और रास्तों से भटक गया।

Author Published on: May 2, 2018 4:15 AM
1971 के आंतरिक विद्रोह और मजूमदार की मृत्यु के बाद यह आंदोलन विभक्त होकर अपने लक्ष्य और विचारधारा से विचलित हो गया।

चौपाल: आतंक पर लगाम

राष्ट्रीय जांच एजेंसी की आर्थिक नाकाबंदी और सुरक्षा बलों की सख्ती से कश्मीर के बाद अब नक्सलवाद के बाबत आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में अच्छी खबर सुनने को मिल रही है कि कई दशकों से देश के विभिन्न हिस्सों में कत्लोगारत मचा रहा लाल आतंकवाद अंतिम सांसें गिन रहा है। 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे देश की सुरक्षा के लिए सबसे अधिक खतरनाक बताया था पर अब यह समस्या समाप्त होने को है। देश में पहले खालिस्तानी आतंकवाद के बाद यह दूसरी दहशतगर्दी की समस्या होगी जिससे निपटने में हम सफल होंगे। लाल आतंकवाद अंतिम सलाम कर रहा है पर अभी उसके पिंडदान का समय नहीं आया है। याद रहे कि नक्सलवादी पलटवार में सिद्धहस्त हैं, इसलिए सावधान रहने व लड़ाई को तब तक जारी रखने की आवश्यकता है जब तक इसकी सांसें रुक नहीं जातीं। नक्सलवाद उस वामपंथी हिंसक आंदोलन का नाम है जो भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ। नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के गांव नक्सलबाड़ी से हुई जहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने 1967 में सत्ता के खिलाफ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की थी।

मजूमदार चीन के कम्युनिस्ट नेता माओ त्से तुंग के बड़े प्रशंसकों में से था इसलिए उसकी सैद्धांतिकी को माओवाद भी कहा जाता है। उसका मानना था कि भारतीय मजदूरों और किसानों की दुर्दशा के लिए सरकारी नीतियां जिम्मेदार हैं जिनकी वजह से उच्च वर्गों का शासन तंत्र और फलस्वरूप कृषितंत्र पर वर्चस्व स्थापित हो गया है। इस न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व को केवल सशस्त्र क्रांति से ही समाप्त किया जा सकता है! 1967 में नक्सलवादियों ने एक अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई। इन लाल आतंकियों ने औपचारिक तौर पर स्वयं को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर लिया और सरकार के खिलाफ भूमिगत होकर सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी। 1971 के आंतरिक विद्रोह और मजूमदार की मृत्यु के बाद यह आंदोलन विभक्त होकर अपने लक्ष्य और विचारधारा से विचलित हो गया। सामाजिक जागृति के लिए शुरू हुए इस आंदोलन पर कुछ सालों के बाद राजनीति का वर्चस्व बढ़ने लगा और यह जल्द ही अपने मुद्दों और रास्तों से भटक गया।

बिहार में इसने जातिवादी रूप ले लिया। कालांतर में गरीबों, वनवासियों व आदिवासियों के अधिकारों के नाम पर अस्तित्व में आए नक्सलवादी या माओवादी हत्या, फिरौती, रंगदारी, लेवी वसूली, सामूहिक दुष्कर्म, नक्सल शिविरों में बच्चियों के यौन शोषण, विकास में बाधक, गरीबों का शोषण करने के लिए कुख्यात हो गए। ये वे तमाम बुराइयां हैं जिन्होंने नक्सलवाद के खात्मे की नींव रख दी है।
’राकेश सैन, वीपीओ रंधावा मसंदा, जालंधर

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