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गुमनामी की चादर

इंग्लैंड में क्रिकेट का चैंपियंस ट्रॉफी और अंतरराष्ट्रीय फील्ड हॉकी प्रतियोगिता के मैचों से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि क्रिकेट और हॉकी में कैसा जमीनी फर्क है।

Author June 26, 2017 5:55 AM
India vs Pakistan: भारतीय हॉकी टीम।

जीत और हार खेल के दो पहलू हैं। एक जीतता है तो दूसरा हारता है। यही जीवन का यथार्थ भी है। हार और जीत को लेकर फिल्म ‘बाजीगर’ का यह संवाद हमें बेहद रोचक लगता है कि जीत कर जो हार जाता है, उसे बाजीगर कहते हैं। लेकिन हमारे देश में हॉकी टीम को क्या कहेंगे? या क्रिकेट को छोड़कर अन्य खेलों को अपनाने वाले खिलाड़ियों को क्या कहेंगे? बेचारी हॉकी डरी सहमी, सकुचाई किसी मैदान में खेली जाती है। खिलाड़ी हार पर आत्मालोचना कर अगले मैच के लिए फिर तैयार होते हैं। अपनी जीत पर भी मन ही मन खुशी का इजहार कर किसी कोने में दुबक जाते हैं। पिछले दिनों इंग्लैंड में खेले गए दोनों खेलों से तो ऐसा ही प्रतीत होता है। इंग्लैंड में क्रिकेट का चैंपियंस ट्रॉफी और अंतरराष्ट्रीय फील्ड हॉकी प्रतियोगिता के मैचों से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि क्रिकेट और हॉकी में कैसा जमीनी फर्क है।

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कहते हैं कि लोगों की व्यस्तता बढ़ी है। लेकिन क्रिकेट को लेकर हमारे पास वक्त ही वक्त है। उस दौर से लेकर आज तक कभी दूसरे खेलों को वह तरजीह नहीं मिल पाई, जो क्रिकेट को मिली। न मीडिया में, न सरकार की ओर से। इंग्लैंड में खेले गए दोनों प्रतियोगिता में भी यही हुआ। क्रिकेट मैच को लेकर लगातार हमारी उत्सुकता बनी रही। लेकिन हॉकी को लेकर हम संवेदनहीन बने रहे। करारी हार की टीस मन से निकालना असंभव लगा। लेकिन हॉकी में शानदार जीत के लिए टीम के खिलाड़ियों को बधाई तक नहीं दी हमने।

यह महज संयोग था कि एक समय में एक देश के साथ दो अलग-अलग प्रतियोगिता थी। लेकिन अक्सर यह देखा जाता है कि क्रिकेट की लहर में अन्य खेलों को भुला दिया जाता है। मैं उन खिलाड़ियों की मनोदशा के बारे में सोच कर परेशान हो जाता हूं कि ये खिलाड़ी जीत के बाद क्या सोचते होंगे? उन्हें जब अपने देश के लोगों की भी सहानुभूति नहीं मिलती होगी तो जरूर वे टूट जाते होंगे। गुमनामी की चादर ओढ़े खिलाड़ी खिताबों को अपने नाम कर लेते हैं।

असल में हरेक चीज को बाजार की नजर से देखने की आदत चमकदार वस्तुओं पर निगाहें टिका देती है। इससे हमारी संवेदनाएं, हमारी सोच उस तरफ बढ़ ही नहीं पाती है। भारत रत्न के लिए सचिन का चुना जाना भी क्रिकेट की चमक और सचिन तेंदुलकर का बाजार में प्रभाव ही था। बाजार की आंखों ने ध्यानचंद का हॉकी के प्रति समर्पण और काबिलियत नहीं दिखी, उन्हें सचिन की चमक दिख गई। इसमें कोई शक नहीं कि सचिन जैसा कोई खिलाड़ी नहीं है। लेकिन ध्यानचंद को कम आंका गया।
यह गौर करने वाली बात है कि अपने दम पर कभी गीता फोगाट, सायना नेहवाल, दीपा कर्मकार जैसी खिलाड़ी देश के लिए पदक तो लाती हैं। लेकिन उसके बाद! हम ज्यादा से ज्यादा उनके लिए फिल्में बना कर उन्हें खुश कर देते हैं। इससे खेल को क्या मिलने वाला है? इतनी बड़ी आबादी वाले देश में कुछ गिने-चुने तमगे लेकर लौटने पर हमें शर्म क्यों नहीं आती? बातचीत के दौरान अर्जुन पुरस्कार विजेता राजेश चौधरी ने कहा था कि किसी देश का खिलाड़ी यह प्रमाणित करता है कि उसका देश, वहां रहने वाले लोग, खासकर युवा कितना मजबूत है, कितना जुझारू है। प्रतिभाओं को अगर बाजार तय करने लगेंगे तो वह मुनाफा देने वाले होगे। अपनी शक्ति के अनुरूप प्रदर्शन नहीं करेंगे।
’अशोक कुमार, तेघड़ा, बेगूसराय

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